गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

हिन्दी अनुवादक भी ब्लात्कार करने लग गए हैँ

कल जब मैं अपने दफ्टर के काम से फुर्सत हो अंतरजाल पैर कुछ करने बैठा तो अकस्मात् एक ब्लॉगर मित्र का गूगल-चैट पैर सन्देश आया... और उसके साथ एक लिंक भी था...

"हिन्दी अनुवादक भी ब्लात्कार करने लग गए हैँ"

हमने पहले तो सन्देश की २-३ बार पढ़ा... फिर सोचा ये कौन ही नई बात है... हिंदी का अपमान, उसका बलात्कार तो दशको से हो रहा है... वो कोई हिंदी का सबसे बड़ा बैरी ही रहा होगा जिसने टेबल-तेनिश की "उच्च मंच पैर दे फटाफट ले फटाफट" कहा होगा... हिंदी का उपहास तो इस देश में एक दर्रे की बात बन गयी है...

फिर खुद की जाने कहाँ का हिंदी-प्रतिनिधि समझते हुए मन ने ये भी कह डाला की बहुतायत ब्याव्सयिक हिंदी अनुवादक ही ऐसा बढ़कर करते हैं... और नहीं तो क्या... सरकारी मोटी पारश्रमिक पाने और वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले हिंदी माता का मान क्या रखेंगे... वो क्या जाने अपने मा और बाहें के दर्द के बारे में जो खुद कभी उन टूटी फूटी गलियों में गया ही नहीं जहाँ उनका दर्द उनकी जिंदगी है... दर्द तो वो जानता है जो रोज आते जाते लोगों की आँखों में पशुता देखता है... देखता है कैसे अंग्रेजी नशा हिंदी के बेटों पैर सर चढ़ता है तो वो हर मन-मरियादा की भूल जाता है...

इतना कहते कहते मन में दुर्बलता आने लगी... हमारे छत्तीसगढ़ में एक कहावत है "पापी का जी प्रायश्चित में" - अर्थ ये की जिसके जी में पाप होता है वो थोड़ी संका होते ही भगवन सुमिरने लगता है. कहने का तात्पर्य ये की ऐसा लगा की कहीं ये हमें ही तो आइना नहीं दिखा रहे हैं? ३ बरस हो गए परदेश में रहते रहते रहते तो अब तो हमारी भी भाषा सकती क्षीण हो रही है... कही इन्होने हमारे ही किसी लेखन की तो नहीं पकड़ लिया मदारी के खेल के लिए... फिर मन की थोडा ढाढस बंधाया की भाई अभी तो हमें स्याही घालते एक अठवारी भी नहीं हुआ है भला कौन अपने देखे हुए बन्दर की हनुमान कहेगा...

हमने फिर उत्सुकता वश उस लिंक की खोल ही लिया (http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/5342912.cms) और पहली लाइन पढ़ते ही हम पर तो जैसे गाज गिर गयी

"सांस्कृतिक मंत्रालय में काम करने वाले एक हिंदी अनुवादक ने नौकरानी से मंगलवार रात...."

हाय राम! क्या सोचा था और क्या निकला हमने तो कहाँ इसे किसी साहित्य का भाषाई दोष पूर्ण लेख संचा था जो किसी ऊँची पहुंचा वाले ने किसी ऊँची पत्रिका में छापा लिया है पर ये कहानी तो छपने-छपाने का नहीं कालिख पोतने की कहानी है... कालिख मानवता के माथे पर.

फिर जब ये विषय सामने आया तो फिर वही बात मन में आई, की हमारे देश में नारी का आपमान करने की तो इतिहास परक गाथा है, जी नहीं मैं किसी भी रूप में उस घटना की छोटा नहीं बना रहा हूँ न ही उसका समर्थन कर रहा हूँ। पर सच कहिये (अपनी आत्मा में झांकर) की क्या ये सही नहीं है? हम जब भी ऐसी कोई घटना सुनते-पढ़ते हैं तो क्या करते हैं? ९९.९% लोग हमें क्या लेना देना कहकर आगे बढ़ जाते हैं। ०.९% लोग जो इस घटना से जुड़े प्रसंग पर थोड़ी चर्चा करते हैं (जैसे हम कर रहे हैं) और फिर आगे बढ़ जाते हैं। बाकी बचे ०.१% लोग जो इस घटना से जुड़े होते हैं वो अपनी किस्मत की कोसते हैं (हाँ जी इसमें घर-परिवार और न्यायिक प्रबंधन के लोग भी हैं) कोई नहीं जानता और जानने का नहीं की जिसपर बीती उसे लग रहा है।

फिर बरबस ही हस दिया... हंसा अपनी लेख पर की क्या पता कितने लोग पढेंगे... और पढेंगे भी तो जाने क्या सोचेंगे... चाहे जो सही... लेकिन एक बार मन में आया तो चलो लिख कर तो देखें, शायद कोई असर पड़े भी?