विक्टर ह्यूगो और एक पिता का अपनी पुत्री से अमर प्रेम
विक्टर ह्यूगो एक महान फ्रांसीसी साहित्यकार थे। विक्टर मारी ह्यूगो का जन्म 26 फरवरी 1802 को पश्चिमी फ़्रांस के शहर "बजौंसों/ Besancon" में हुआ था और उनकी मृत्यु 22 मई 1885 को 83 साल की उम्र में पेरिस में हुई। ह्यूगो ने लगभग 60 वर्षों तक साहित्य की सेवा की और इस दौरान उन्होंने ने कविता, कहानी, उपन्यास, डॉयरी, व्यंग, राजनितिक लेख और नाटक आदि बहुत सी विधा में लेखन किया है जो प्रमुखता से प्रेम और सौंदर्य पर आधारित होते थे। वे प्रमुखता से अपने दो उपन्यासों "नोत्रे दाम द पारी" (Notre-Dame de Paris - 1831) और "ले मीज़राब्ल" (Les Misérables - 1862) के लिए विश्व विख्यात हैं। उनकी दो कविता संग्रह "ले कंटेम्पलेशन्स" (Les Contemplations - 1856) और "ला लेजेंड डेस सिएकल्स" (La Légende des siècles1859) जिसका मतलब "युगों की कथा" है फ्रांस के साहित्य में शिखर माने जाते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ह्यूगो को किसी एक विधा में बाँध पाना सम्भव नहीं क्योंकि यदि आप उनको साहित्यकार ही मानेंगे तो यह भी जान लेना चाहिए की उन्होंने 4000 से भी अधिक चित्र बनाये हैं इसलिए वे एक स्थापित चित्रकार भी थे। इसके साथ ही वे एक प्रगतिवादी समाज सुधारक भी थे और सामाजिक चेतना जगाने के ढेरों काम किये हैं। एक राजनितज्ञ के रूप में "मृत्यु दंड" के खिलाप समाज सुधर का उनका प्रयास विशेष उल्लेखनीय है।
विक्टर ह्यूगो की प्रिय बेटी, लियोपोल्डिन की अकाल मृत्य उनके जीवन की सबसे दुःखद घटना है। उनकी बेटी 4 सितंबर 1843 को सीन नदी में अपने पति चार्ल्स वैक्वेरी के साथ यात्रा कर रही थी तब किसी कारण से उनकी नाव पलट गई और सीन नदी के निर्दयी तीव्र प्रवाह में बह जाने से उन दोनों की जान चली गई। ह्यूगो उस समय दक्षिण फ्रांस में यात्रा कर रहे थे और उनको इस दुर्घटना की जानकारी एक अखबार में छपे समाचार से मिली। जब लियोपोल्डिन मृत्यु हुई तब उसकी आयु केवल 19 वर्ष थी और इस घटना ने ह्यूगो को को स्तब्ध कर दिया। उन्होंने इस गहरे आघात के विषय में अपनी एक प्रसिद्द कविता "आ विलेक्वियर"(À Villequier) में लिखी है। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के जीवन और मृत्यु पर कई कविताएँ लिखीं जिनमें से एक है उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता "द मैं , देस ल'आबे" (Demain, dès l'aube - 1847) है, जिसमें उन्होंने अपने बेटी के कब्र पर जाकर फूल चढाने का वर्णन किया है। हिंदी साहित्य के प्रेमी महा कवि निराला जी की कविता 'सरोज स्मृति' के समकक्ष मान सकते हैं। और उनको यह बताना काफी होगा कि विक्टर ह्यूगो की इस कविता को पश्चिमी साहित्य में एक पिता की ओर से उसकी दिवंगत बेटी की याद में लिखी सबसे महान कविताओं में से एक माना जाता है।
महान फ्रांसीसी साहित्यकार विक्टर ह्यूगो को श्रद्धांजली के रूप में प्रस्तुत है उनकी दो कविताओं का हिंदी में काव्यानुवाद:
1) विलेक्वियर में - "À Villequier, 1843"
हे ईश्वर!
मेरी अतृप्त आँखें बार बार
अतीत की ओर मुड़ जाती हैं,
क्योंकि वर्तमान में
मेरे मन को सांत्वना देने वाला
कोई पल नहीं है
मैं बार बार
अपने अतीत के
उस पल को याद करता हूँ
जब मैंने उसे
अपने पंख फैलाकर
उड़ते हुए देखा था!
अब उस बीते पल के
बाद कुछ नहीं है
और मैं उस पल को
मरते दम तक याद करूंगा
उस पल को जब मैंने
बिलखते हुए कहा था-
वह बच्ची
जो एक पल पहले तक मेरी थी
क्या वो सचमुच-
अब मेरे पास नहीं है?
2) कल, पौ फटते (Demain, dès l'aube, 1847)
--------------------------------------------
कल, पौ फटते ही
जब सुबह की लालिमा
छाने लगेगी चारों ओर
तुम देखना
मैं निकल पडूंगा
मुझे मालूम है
कि तुम्हें भी
इंतजार है मेरा
मैं आऊंगा
जंगलों के रास्ते
और मैं आऊंगा
पहाड़ों को लांघ कर
क्योंकि अब
तुमसे दूर
रहा नहीं जाता
मैं चलता रहूँगा
खोया अपने ख़यालों में
ना मैं कोई नज़ारे देखूँगा
और ना ही मुझे कोई
संगीत सुनाई देगा
अकेला,
अनजाना,
कमर झुकाये
और दुःखी मन से
हाथ बाँधे आऊँगा
जब मेरे लिए
दिन भी किसी रात जैसी
काली होगी
नहीं देखना मुझे
सुनहरी शाम की छटाएँ,
और ना ही
आरफ्लर* में उतरती
नौकाओं को
और जब मैं पहुँच जाऊंगा
तुम्हारी मज़ार पर
तब मैं वहाँ
होली** के हरे पत्ते
और हेदर*** के फूलों वाला
एक गुलदस्ता रखूँगा
-------------------------------
*Harfleur - उत्तरी फ़्रांस का एक छोटा सा गाँव जहाँ से नौकाएँ इंग्लिश चैनल में जाती हैं
**Houx/Holly - एक सदाबहार वृक्ष जिसके पत्ते हमेशा हरे होते हैं
***Bruyère/Heather - एक खास तरह का फूल जो यूरोप में पाया जाता है