मंगलवार, 17 सितंबर 2013

कालिमा जली न निज मन की

कालिमा जली न निज मन की,
होली हर वर्ष जलाते हैं।
हम पहन मुखौटा राग द्वेष,
स्वारथ के रंग उड़ाते हैं॥

अब समय नहीं तब सा पावन,
ना कोई जले मानवता पर।
प्रभु पर भी वह विश्वाश नहीं,
सबने ली है दानवता धर॥
इतना साहस अब किस्मे है,
उस पापिन का उद्धार करे?
प्रहलाद न बनाता अब कोई,
होलिका खड़ी चीत्कार करे॥


वृद्धावस्था की ड्योढ़ी पर,
जीवन संध्या की वेला में।
बिन अस्त्र-सस्त्र निज पशुमन ने,
यह काम कर दिया हेला मैं॥
स्तम्भ प्रतिष्ठित करें किसे,
वह शक्ति कौन यह पीर हरे?
हिरनकश्यप तो पिता नहीं,
पर पुत्र स्वयं नरशिंह बने॥

यमुना में विषधर अब भी है,
विष भरे फनों  फुत्कारे।
वह कान्हा अब न मथुरा में,
कालिया दमन कर फटकारे॥
अब कटता है वो पेड़ कदम्ब,
जलती सद्भावों की होली।
राधा, सब सखियाँ जायें कहाँ,
चहुँ ओर  है कलुषित खल टोली॥

सर्वत्र अमंगल बीत रहा,
मन का धीरज डगमग डोले।
क्या शेष नहीं कुछ करने को?
कातर स्वर में पौरुष बोले॥
मन का ढाढस बंधे रखना,
यह रात बीत ही जाएगी।
खेलेंगे खुशियों की होली,
वह सुबह कभी तो आएगी॥

कालिमा जले अब निज मन की,
ऐसी होली इस वर्ष मने।
हम वरण  करे अब राग-हर्ष,
जीवन के रंग गुलाल बने॥

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हेला में = खेल-खेल में
फुत्कारे = फुत्कार/फुक्कार करे
कातर = व्याकुल, व्यथित

{बुधवार ८ मार्च २०००, जांजगीर}

एक पाकिस्तानी ने बनाया 'रामपुर'

(अमेरिका में २००६ के सुरुआति दिनों की स्मृति से)

बचपन से पढ़ते सुनते आ रहे हैं पाकिस्तान और पकिस्तानियो के बारे में, पर कभी मिला नहीं था किसी से। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की बात तो अब ऐसी हो गयी है जैसे की रोज मर्रा की बात हो। एक ही आँगन के दो तुकडो में रहने वाले दो परिवार, अपनी-अपनी महात्वाकंक्षा में इतने डूब गए की अपना इतिहास भी भुला बैठे।

'बार्डर' फिल्म के युद्ध के दृश्य के गाने की वो पंक्ति मुझे सबसे सटीक लगाती है हमारे रिश्ते के बारे में, - 'मेरे दुश्मन, मेरे भाई, मेरे हमसाये....'

जब बात फिल्मो की आई तो एक और फिल्म के एक संवाद की याद आ रहा है जिसका भाव कुछ ऐसा था की हिन्दुस्तानी शक्कर पाकिस्तान की खाते हैं, और पाकिस्तानी पान बनारसी लेकिन दोनो बोलेंगे हमेशा एक दूसरे के लिए कड़वी बात।

जब कारगिल की लड़ाई हुयी कोई हिन्दुस्तानी नहीं जिसका खून ना खौला हो। एक ओर हमारे प्रधानमंत्री शांति का संदेश लेकर बस से इस्लामाबाद पहूँचते हैं तो दूसरी और पीठ पीछे कारगिल में पाकिस्तान की सेना घुसपैठ करती है। दगाबाजी का ऐसा उदाहरण और कहाँ?

भारत-पाकिस्तान के बीच तो क्रिकेट का खेल भी किसी युद्ध से कम नहीं होता। पूरी दुनिया (जहाँ कहीं भी क्रिकेट खेला जाता है) दिल थाम कर देखती है दोनो चिर-प्रतिद्वंदियों का खेल।

पता नहीं क्यों, पर कुछ समय से मेरा रुझान पाकिस्तान की राजनीती की और बढ़ाने लगा है। हाल में जो कुछ हुआ वहाँ उस पर तो जैसे मैंने पैनी नजर गडा रखी है। और इसी बात पर मन हुआ की आप लोगों से जरा अपनी बात साझा कर लूं।

बात पिछले साल की है (२००६) जिस दिन मैंने अमेरिका की धरती पर अपना पहला कदम रखा। जैसा सुना था ठीक वैसे ही हमारा भी सामान साथ के जहाज में नही आया और १/२ घंटे की भगा-भागी के बाद पता चला की २-३ दिन लग सकते हैं तो थक हार कर हाथ में होटल का पता और अपने मेनेजर का फ़ोन नंबर लिए मैं और मेरा एक साथी शार्लेट-डगलस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर आये।

सामने ही टैक्सी स्टैंड था तो हम अपना सामान लेकर आगे बढे। एक सज्जन ने मुस्कराहट के साथ हाथ दिखाया तो हम कुछ समझ नही पाए। वो आगे आये और पूछा- 'जी कहाँ चलाना है?' जी हाँ उन्होने हिन्दी में ही पूछा की कहाँ चलाना है? हम तो समझ ही नही पाए की ये क्या संयोग है, अमेरिका आते ही पहला आदमी हिन्दुस्तानी मिल गया। हम तो खशी-ख़ुशी उनकी कर में बैठ कर निकल पड़े।

मेरे साथी ने उनसे बात करनी सुरु की। फिर हमने पूछा की आप इंडिया में कहाँ से हैं? तो टैक्सी वाले ने जवाब दिया- 'जी इंडिया से नही पाकिस्तान से हूँ'। पाकिस्तान! तो आप पाकिस्तानी हैं? 'जी हाँ'।  जी चलिए, आपसे मिलकर बड़ी ख़ुशी हुई' और फिर इसी तरह की इधर-उधर की बातें होने लगी। २०-२५ मिनट में हम होटल पहुंचे तो कमरे में पहुंचते ही सीधे बिस्तर पर जा गिरे।

कुछ दिन और गुजरने के बाद समझ में आया की यदि अमेरिका में आपके पास कार नहीं है तो समझिए की आप बेबस हैं। भारत की तरह यहाँ घर से निकलकर सामने किराने चाय या फ़ोन वाले की दुकान नहीं मिलती। यहाँ बडे-बडे नाम वाले दुकानों की शाखाएं होती हैं, और वो भी अच्छी दुरी पर। मतलब ये की आप को कुछ लेना हो तो कार चाहिऐ। आपके पास न हो तो किराये पर ली जिए। फिर क्या हम भी वही करने लगे जो सभी पहली बार आने वाले लडके करते हैं - टैक्सी।

एक दिन शाम को सामान लेने के बाद हमने टैक्सी वाले के ऑफिस फ़ोन किया और कहा की हमें फलां-फलां जगह पर टैक्सी चाहिऐ। टैक्सी वाले ने कहा १५-२० मिनट पर हम ३० मिनट से रुके रहे और कोई नही आया। इसी बीच देखा की एक टैक्सी बहूत देर से खडी है क्यों न उसी से पूछा जाये यदि चले तो और हम टैक्सी के पास पहुंचे। इससे पहले की हम कुछ पूछें, टैक्सी वाला खुद ही बाहर आया और बोला-'जी टैक्सी चाहिऐ क्या? बताइए कहाँ जाना है?' अरे वह, एक और हिन्दी बोलने वाला मिल गया। पर ये भी पाकिस्तानी न हो। जिस दिन से आये हैं सिर्फ पाकिस्तानी टैक्सी ही मिलती है कोई हिन्दुस्तानी नहीं मिला।

ऊपर वाले ने शायद हमारी खुस-फुसाहट सुन ली और ये भाई भी पाकिस्तानी ही निकला, नाम था - 'सोहेल'। चलो अब तो आदत होने लगी थी। वैसे सच कहूं तो अपने देश से इतनी दूर आने पर पाकिस्तानी भी अपने देश का नहीं तो कम से कम पडोसी होने के नाते जंचने  लगे थे।

अब तो हमें जहाँ कहीं भी जाना हो तो हम सोहेल को ही बुलाने लगे। संयोग से एक के बाद एक मेरे कई साथी इसी शहर में आते गए और उसे बुलाने का सिलसिला जैसे बढ़ता ही चला गया। हम जिस कालोनी में रहते थे उसका नाम "ऑटम-पार्क" और वहां पर अधिकतर हिंदुस्तानी परिवार और हम जैसे लड़के रहते थे और ये बात बातों बातों में उसे भी पता चल गई।

ऐसे ही एक दिन हम कुछ मित्र वाल-मार्ट में घुमने गए थे जो घर से ज्यादा दूर नहीं था तो टहले चले गए थे। खरीददारी करने के बाद सामान भी था और घुमने की थकान भी तो घर जाने के लिए मैंने सोहेल को फ़ोन लगाया।  फ़ोन की १-२ घंटी के बाद सामने से पहचानी सी आवाज आई - "हेलो"। हमने भी कहा - "हेलो सोहेल भाई, मनीष बोल रहा हूँ। हम वाल-मार्ट में है और घर जाना है, आप आ सकते हैं?"  जवाब आया - "क्यों नहीं? आप बुलाएं और सोहेल न आये ये तो हो ही नहीं सकता"

सोहेल आये और हम टैक्सी मैं बैठकर निकल पड़े। रस्ते में उनको एक फ़ोन आया और वो बात करने लगे. किसी बात पर सामने वाले पूछा की कब तक आओगे?

इस सोहेल ने बड़ी सहजता से जवाब दिया - "जी जल्द ही लौट आऊंगा, बस ये मनीष भाई और दोस्तों को छोड़ कर "रामपुर" में". उसकी बात सुनकर उत्सुकता हुयी तो हमने पुछा कहाँ जा रहे हैं कहा आपने?. तो जवाब मिला - "अरे जहाँ हमारे हिंदुस्तानी भाई रहते हो वो जगह अमेरिका में तो क्या दुनिया में कहीं भी हो तो रामपुर ही कहलाएगी ना?"

और तबसे वो हमारे पते को रामपुर कहने लगे और हम भी खुश होते थे उनकी ये बात सुनकर। 

आईना

उसे आईना
पसंद नहीं है,
कि  आईना 
उसके सारे
भेद खोल देता है

बोल देता है 
सारी  बातें बेबाक-
जो उसे दिखाई देती हैं 

नकाब 
के पीछे की
असली सूरत
आईने  से
छिपती नहीं है,

दिखावे का रंग रोगन
चाहे कितना भी 
पुता हो,
चहरे की हकीकत-
साफ़ नज़र आती है

उसे चिढ़  है
आईने से
कि  आईने में- 
उसकी असलियत
साफ़ झलकती है,

छलकती है
उसकी बेईमानी,
जिसपर उसने ईमान का 
चोला चढ़ाया है

आईने की 
ये साफ-गोई 
उसे मंजूर नहीं,

और वो
तिलमिला उठता है,
   
सहे भी कैसे?

मुखौटे से ढंकी
उसकी कायनात
शीशे में
रेत की ढेरी
नजर आती है,

अब उसने
कर लिया है फैसला,
कि मिटा देगा
वज़ूद,

न रहेगा आईना
और न उसे
ये रोज की
जिल्लत होगी,

गुस्से में भर कर
वो तोड़ देता है आईना,

मगर ये क्या?

कल तक तो
एक ही था-
पर आज

उस आईने के
सौ तुकडे हैं

और हर टुकड़ा
चीख-चीख कर-
उसकी बेबसी
बयान करता है...


(शनिवार ४ नवम्बर २०००, जांजगीर)