गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

तलाश!

तलाश,
हाँ तलाश,
एक मंजिल की,
जिसने मुझे आगे बढ़ने
को मजबूर किया|

घर से गली
गली से गाँव,
पचपन से जवानी तक,
बढ़ता गया
कदम-दर-कदम|

हर कदम पर
यूँ लगा कि
जिसकी तलाश में
निकल आया इतनी दूर-
सामने खड़ी है
बस-
अगले कदम पर|

अब तो लगता है
मृग-तृष्णा की इस
दौड़ में,
खो दिया है खुद को
कहीं किसी मोड़ पर|

और अब
इक नयी तलाश है,
तलाश-
अपने अस्तित्व,
अपनी पहचान की!