मंगलवार, 23 सितंबर 2008

फिर बहार आएगी

जाती हुयी बहार
लिए जा रही उसके
अरमान,

पत्ता-पत्ता जैसे
झड़ रही हो उसकी
आस,

बिखर रहे हों
तिनका-तिनका उसके
सपने,

मुरझा रहे हों
उसके मुरादों के
फूल,

सुख रही हो
उसके हिम्मत की
डाल,

पर जाके कोई
कह दो बागबान से-
कि बीत जायेंगे
पतझड़ के ये दिन भी,
और उसके चमन में
एक बार-
फिर बहार आएगी॥

1 टिप्पणी:

संजीव आनंद ने कहा…

बहुत दिनों बाद आप ब्‍लाग की दुनिया में आये मनीष भाई, सचमुच में बहार आई ।



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