शनिवार, 12 नवंबर 2011

नयी राह


चलते-चलते जीवन पथ पर,
एक नदी के सुंदर तट पर|
देख किसी तरुवर की छाया,
सुस्ताने को मन हो आया||

 

 

कर विचार यह सुंदर उपवन,
सुखकर होगा इसमें जीवन|
संगी-साथी मीत बनाये,
प्रेम भाव के दीप जलाये||

यह करते कुछ समय बिताया,
फिर नियति ने खेल दिखाया|
कल तक जिसको श्रम से साधा,
आज लगे वह पग में बाधा||

 

 

हा! कितना छल? मायामय जीवन!
पल-पल नित नूतन परिवर्तन|
तिनका-तिनका नीड़ बनाकर,
फिर चल निकले नयी राह पर||

( नागपुर सोमवार, २८-०४-२००३)

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