सोमवार, 21 अक्टूबर 2024

बात दिल की

बात दिल की ज़ुबाँ पर ना लाना कभी 

क्या हुआ है किसी का जमाना कभी 


तुम जो दिल खोल कर बात कह जाओगे 

फिर हँसी के ही किरदार रह जाओगे

उँगलियाँ तो उठाते सभी हैं यहाँ  

गलतियाँ भी गिनाते सभी हैं यहाँ 

इनके झाँसे में देखो ना आना कभी 


जिन चरागों को आंधी बुझा ना सकी

उनको साँसों की रफ्तार भारी पड़ी 

कश्तियाँ जो समन्दर को थीं नापती

उनको दीमक किनारे में आकर लगी 

खेल में जीत तो मात खाना कभी 


हाथ की सिलवटें माथ पर छप गईं

दौड़ते-भागते ज़िंदगी खप गई 

चंद रुपयों की खातिर जवानी गई 

ठोकरों में भले जिंदगानी गई 

हार कर भी मगर मुस्कुराना कभी 


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मनीष पाण्डेयमनु

सोमवार 21 अक्टूबर 2024, नीदरलैंड

सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

परदेसी

परदेसी
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आसमान में
तारामण्डल देख
मन ही मन गुनता हूँ
मेरा घर
किस दिशा में होगा?

घड़ी देख के
अंदाजा लगाता हूँ
कितना बजा होगा वहाँ अभी?

कल्पना करता हूँ
माँ क्या कर रही होगी?

याद करता हूँ
मैं क्या करता था
जेठ-वैशाख की
उजली रातों में?

घर लौटते हुए
सड़क छोड़
गली पकड़ते ही
बचपन की
गली याद आती है

गली की छोर से
घर का दरवाजा देख
माँ को खोजता हूँ
दुआरे पर खड़ी
राह तकते
स्कूल से आने में
जब देर हो जाती थी

ब्याह के
पिया घर आई
बिटिया की तरह हर
छोटी-बड़ी बात पर
बाबुल के घर को याद करते हैं
परदेसी भी

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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
नीदरलैंड्स, शनिवार 14 मई 2023
परदेसी
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असमान म छाए
तराई ल देख के
मने मन म गुनथंव
मोर घर कोन दिसा म होही?

घड़ी ल देख के
बिचार करथंव
उंहा का टाइम होत होही

सोंचे लागथंव
दाई हर अभी
का करत होही?

सुरता करथंव
मैं काय करंव
जेठ-बईसाख के
अंजोर रथिया?

काम ले
घर वापिस आत
सड़क ले
घर के रद्दा आय म
लाइकाइ के गली हर
सुरता आथे

आऊ दुरहिया ले
घर के मुंहटा देख
दाई ल टोहे लागथे
आँखी

बिहाव-पठौनी होय
बेटी कस
घेरी-घेरी
माइके ल सुर्राथें
परदेसिया भी

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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
नीदरलैंड्स, शनिवार 14 मई 2023

शनिवार, 12 अक्टूबर 2024

रावण

दसग्रीव दशानन् दसकंधर कहलाता था
जब रावण चलता सारा जग हिल जाता था
वो था पंडित-विद्वान और था बलशाली
उसके सन्मुख देवों का जी थर्राता था

रावण ने सोने की लंका बनवाई थी
तीनों लोकों में उसने धाक जमाई थी
नवग्रह सारे उसकी मर्जी से चलते थे
शिव की भक्ति से उसने शक्ति पाई थी

था कुम्भ करण के जैसा कोई  बली नहीं
कुछ मेघनाद सन्मुख देवों की चली नहीं
अहिरावण, खर-दूषण के जैसे भाई थे
उस पर भी उसके माथे संकट टली नहीं

थी धू-धू कर के दहकी लंका सोने की
फिर आई बारी भाई-बेटे खोने की
दस शीश कटाकर धरती पर वो पड़ा रहा
बस आती थी आवाजें सब के रोने की

जब उसके हाथों नारी पर अन्याय हुआ
फिर जग में कोई उसको नहीं सहाय हुआ
माटी में मिल गया अहम उसका सारा
वो युगों-युगों तक पाँपी का पर्याय हुआ

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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
नीदरलैंड्स, शनिवार 12 अक्टूबर 2024