रविवार, 25 नवंबर 2007

शिक्षक या गुरु?

मेरे पिता एक 'शिक्षक' हैं, ये बात मैं तब से जानता और बोलता था जब मैं अबोध बालक था। तब मैं ये जानता भी नहीं था की मेरे पिता शिक्षक क्यों हैं? कोई ब्यक्ति वकील, डॉक्टर, पुलिस या शिक्षक होता क्यों है? बस ये जानता था की मैं जिस विद्यालय में मैं पढ़ता हूँ, वो भी वंही की अन्य कक्षा में पढाते हैं। सार ये कि मेरे पिता एक शिक्षक हैं और मैं एक विद्यार्थी।

समय के साथ थोडा और ज्ञान हुआ तो जाना की जो हमें स्कूल में पढाते हैं वो हमारे 'गुरु' हैं और हम उनके 'शिष्य'। वैसे ही जैसे ऋषि 'धौम्य' या 'सान्दिपनी' गुरु थे और जैसे 'उपमन्यु/आरुनी-उद्दालक' या भगवान् 'कृष्ण' शिष्य।

इन सभी कि बीच मैंने श्लोक सीखा-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवेनमः

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, गुरु ही स्वयम परब्रह्म हैं और उन गुरु को मेरा प्रणाम है.
अब तो विषय और भी जटिल हो गया, पहले तो मैं शिक्षक से गुरु तक कि यात्रा को बड़ा मान रहा था और अब तो बात त्रिदेव और पारब्रह्म तक जा पहुंची।


तो क्या मेरे पिता गुरु हैं? ऋषि धौम्य कि तरह? ऋषि सान्दिपनी कि तरह? और मैं, मैं कृष्ण तो नहीं पर उपमन्यु या आरुनी? और फिर क्या वो सभी शिक्षक जो किसी न किसी शाला में पढाते हैं वो गुरु हैं? और वो सभी जो वहाँ विद्या ग्रहण करने जाते है वो शिष्य हैं? और फिर मेरे गुरु ने ऐसा कुछ आदेश दिया जैसा उपमन्यु और आरुनी कि मिला था तो? तो क्या मैं इतना आज्ञाकारी हूँ? तो क्या यदि मैंने उनकी आज्ञा मानी तो वो मुझे भी सर्व ज्ञाता होने का वर दे सकते हैं?


दिन बिताते गए और मैं उत्तर कक्षाओं में बढ़ता गया। बालपन से तरुनाई तक आते-आते और बहूत सी घटनाएं देखी और सुनी। सुना कि किसी शिक्षक ने अपने एक विद्यार्थी कि इतना पीटा कि कई दिनों तक उसका स्वस्थ बिगडा रहा। फिर ये भी सुना की किसी छात्र ने नक़ल करते पकड़ने पर शिक्षक पर हाथ उठाया। पर ये कैसे संभव है?

कैसे कोई गुरु अपने शिष्य के प्रति निर्दयी हो सकता है? और कैसे कोई शिष्य आपने गुरु को आहात कर सकता है? शिष्य तो 'कर्ण' भी था, वो कर्ण जिसने गुरु की निद्रा भंग करने से भला आपने को कीडे से कटा लिया? किन्तु कर्ण को क्या मिला? गुरु का श्राप? और गुरु दोन ने क्या किया? अर्जुन को दिए आपने वचन के लिए 'एकलव्य' का अंगूठा ले लिया?

पर ये सब तो शास्त्रों और पुराणों की बातें हैं। युगों पूर्व की बातें हैं? तब जब लोग आपने गुरु को सबसे बढ़कर मानते थे। गुरु की महत्ता तो कबीर ने ऐसे बखान की है-

गुरु गोविन्द दोउ खडे, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो मिलाय॥

गुरु का स्थान गोविन्द से भी बढ़कर होता है। सद्गुरु के बिना तो परमार्थ की प्राप्ति हो ही नही सकती। माता-पिता तो जन्म देते हैं, किन्तु वो गुरु ही है जो हम-आपको को मनुष्य बनाते हैं। गुरु के बिना ज्ञान नही मिलता और ज्ञान के बिना मनुष्य पशु से बढ़कर नही।

गुरु की परिसीमा इतनी सीमित भी नही है। वैसे तो मनुष्य का सर्व प्रथम गुरु उसकी माता होती है। और ऐसे ही पिता, भाई-बंधू और व्यापक रूप में ये पूर्ण समाज हमारा गुरु होता है।

ये सब तो ठीक है, किन्तु अपना प्रश्न तो जहाँ का तहां है! क्या आज के शिक्षक 'गुरु' के उपमेय हैं? क्या आज उनका समाज के प्रति योगदान है जो उर्ध्व वर्णित है? क्या केवल शाला में पढ़ने मात्र से कोई गुरु बन सकता है? शिक्षक होना क्या आज केवल एक व्यवसाय बन गया है? ट्यूशन की मारा-मारी, निजी विद्यालयों की चमक-दमक और उनका व्यवसायिक कारोबार क्या गुरुकुल के समकक्ष रह गए हैं? जींस की पैंट पहन कर छात्रों के साथ गलबहियाँ करते नए उम्र के लडके क्या गुरु की गरिमा को बचा रहे हैं? क्या आज के शिक्षक, गुरु होने की गुरुता तो समझते हैं?

और फिर केवल एक पक्ष को क्यों दोष देना? कभी खुद के भीतर भी झाँक कर देखना चाहिऐ! क्या आज हमारा समाज शिक्षक को गुरु का स्थान देता है? क्या हम १५०/- महीने की ट्यूशन लगाकर पढ़ने वाले को एक काम करने वाले की दृष्टि से नही देखते?

आपने देखा है किसी छात्र को अपने शिक्षक के चरण स्पर्श करते हुए? यदि आप एक पिता हैं तो बताइए की पिछली बार कब आपने अपने बेटे/बेटी की शिक्षक को बिना कारण मान दिया है? यदि आप एक छात्र/छात्रा हैं तो जरा बताइए आप अपने शिक्षक के प्रति क्या भाव रखते हैं?

चाहे हम ये स्वीकार करें या नही, किन्तु ये निश्चय ही सत्य है की समाज का भविष्य शिक्षक के हाथ में होता है। आज के छात्र कल के नागरिक होंगे। उनमें से ही कुछ अभियंता, अधिवक्ता, चिकित्सक, राजनीतिज्ञ और न जाने क्या क्या बनेंगे।? और हाँ, उनमे से कुछ शिक्षक भी तो बनेंगे!

अगर शिक्षक ने सही शिक्षा नही दी तो ये मान कर चलिए की समाज का भविष्य अंधकारमय है। माटी जब कच्ची होती है तभी उसे किसी रूप में ढाला जा सकता है। एकबार ये माटी समय ताप में सूख गयी तो कोई कुम्हार उससे कुछ नही बना पायेगा। और फिर वो माटी जो बर्तन, खिलौना या फिर भगवन की मूरत बन सकती थी वो केवेल मिटटी का एक टुकडा रह जाएगा। और फिर हम सभी पढ़ है-

गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़-गढ़ काढे खोट।
अंतर हाथ सहर दै , बाहर मारे चोट॥

निशित ही आज समाज में शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट आई है, परन्तु ऐसा नही है की सब कुछ समाप्त हो गया है। उत्थान और पतन प्रकृति की नियति है। समय के साथ मनुष्य की विचारधारा बदलती जाती है। जीवन के मायने बदल जाते हैं। ये समाज हम और आप से बनता है। वो हम और आप ही हैं जी कहीं-न-नहीं अलग-अलग नाम, रंग और रूप में होते हैं।

छात्र जीवन मनुष्य के जीवन का वो काल है जब हमारे चरित्र और व्यक्तित्य का निर्माण होता है। हम और आप जैसे होंगे, हमारा समाज वैसा हो होगा। आज हम और आप जो कुछ भी हैं वो हमारे गुरु का निर्माण है। उनकी दी हुयी शिक्षा और ज्ञान आज हमारी पहचान है।

ये हमारा संयुक्त उत्तरदायित्व है की हम जब गुरु के रूप मैं हैं तो उसकी महिमा का ध्यान रखें और जब छात्र हैं तो उसकी मर्यादा का। गोस्वामी तुलसी दास जी ने मानस में लिहा है की-

जाकी होय भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी टिन तैसी।

अर्थात यह की बहूत बार जो हमें दिखाई देता है वह वो नही होता जी वास्तव है, बल्कि वो होता है जी हम देखना चाहते हैं। हम मानते हैं इसलिए पत्थर भी भगवन कर पूजे जाते हैं। नही तो चलते हुए किसी पत्थर के टुकडे पर पैर लगे तो कैसा दर्द होता है?

हम अपने शिक्षक को गुरु का मान देंगे तो अवश्य ही एक दिन हम लाभान्वित होंगे। द्रोणाचार्य का नाम अर्जुन से हुआ, और अर्जुन को अर्जुन द्रोणाचार्य ने बनाया। शिक्षक और छात्र एक दूसरे के पूरक हैं। जब हम ही आरुनी या उद्दालक नही होंगे तो कैसे हम धौम्य जैसे गुरु की अपेक्षा कर सकते हैं?

बदलते सामाजिक परिवेश में सभी कुछ बदल जाते हैं। कल के गुरुकुल आज के विद्यालयों में परिणित हो गए तो वैसे ही कल के गुरु आज के शिक्षक में। पर उनके स्थान और महत्व में में कोई कमी नही आई है और आ भी नही सकती।

शिक्षक और गुरु के बीच तुलना किसी लाभ का विषय है नही क्यों की वर्तमान सामाजिक परिवेश में शिक्षक ही 'गुरु' है।

अंततः हम और आप आज जो कुछ भी हैं वो हमारे गुरु की ही कृपा है।

अतएव गुरु के चरणों में सादर प्रणाम!

7 टिप्‍पणियां:

हर्षवर्धन ने कहा…

शिक्षक का स्थान सच में ऐसा ही होता है। समाज के हर पहलू में गिरावट से गड़बड़ियां आई हैं। लेकिन, ये तो सही है कि गुरु सर्वज्ञाता बना सकता है। सही जा रहे हैं आगे लिखिए।
एक छोटी सी सलाह है वर्ड वेरीफिकेशन हटा दीजिए। टिप्पणी करने वालों के लिए आसानी हो जाएगी।

ashwini kesharwani ने कहा…

manish ji,
tumhare vichar blog me padha, achchha laga...tum to darshnik jaise likhte ho, tumhare vichar aur tumhari kavita mujhe achchhi lagi, badhai.
prof. ashwini kesharwani

निर्मल ने कहा…

प्रियवर , शिक्षक-गुरू दोनों शब्दों के भावार्थ में कोई फर्क नहीं है। आप का चिन्तन सार्थक है। समाज के हर क्षेत्र में पतनशीलता आई है।

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

वाह मनीष भाई, बहुत सुन्‍दर प्रस्‍तुति है, प्रोफेसर जी नें कह ही दिया दार्शनिक हो आप, सचमुच में आपकी लेखनी गजब की है, चिंतन को थोडा और परिष्‍कृत करें ।
छोटे भाई आपमें हमें अपार संभावनायें नजर आ रही हैं । आपके इस चिंतन को हृदय से स्‍वीकार करता हूं, इस लेख को पढते हुए मेरे मन में भी वैसे ही भावनाये उमड रही थी जैसे आपके मन में है । यानी जो आप कहना चाहते हैं उसे पाठक नें आत्‍मसाध किया है ।

स्‍नेह

संजीव

Riya ने कहा…

Manish Ji,
Aapka prasang pada, Aapke shabdo me gahraai to hai., per kahi kuch kami nazar aai.Aapke vichar parishkrut nahi hai.Aapke wicharo ko bad kar laga ki aap khud hi thoda confuse hai, ki aap jo likh rahe hai kitna sahi hai.
Guru aur shishya humare bich me se hi aate hai.A GURU should be impartial.Wo shiksha ka daan deta hai.Aur barso se chali aa rahi pratha ke anusaar wo guru diksha sirf naam ke liye leta hai..
Aur har parson apne jeevan ke aakhiri time tak ek student hota hai.
Aapne guru Drona ka jikra kiya hai aapne prasang me.Mera sochna hai ki A teacher should be impartial. Wo apne sare student ke sath samaan behave karta hai.Arjun ke diye wachan ke karan aklavya ko saza??Ye kaisa insaaf hai??Kya Dronacharya ko guru maanane ka ye parinaam hota?? Shayad yadi Aklavya ko pata hota to wo sochata..Aur shayad uske baad kitne hi logo ne socha hoga Dronacharya ke paas jane se pahle.
Aur wahi dronacharya, apne putra ke liye unki bhawnaye kyon change ho gai? Kya sirf isliye ki wo unka shishya hone ke sath-2 unka putra bhi tha..
Manish Ji,Hum guru-shishay ke rishte ki baat karte hai to, ye sach hai ki roop kafi vikrit ho gaya hai.Aur iske liye naa sirf student & teachers responsible hai, waran humara samaaz bhi shamil hai..
Per dukhad baat ye hai ki in kuritiyon ko door karne ke liye koi bhi aage nahi aana chahta.Ye jaante aur maante sabhi hai, ki buraiyan dher hai per, aage bad kar unhe rokne ka sahas koi nahi karta.Sab intzaar karte hai ki koi aaye aur uski raah aasan banaye..
sab RAM, Krishna ke intzar me hai.Jabki Bhagwan bhi humne yahi sikhane ke liye avtaar lekar dharti per aaye the ki kisi ek ko aage aana hoga, phir sab uske sath aa jate hai

Manish Pandey ने कहा…

Riya Ji,

Aapki tippani ko main apane liye ek prerana shrot ki bhanti swikar karta hoon.

Mera prayash sada hi sikhane aur parishkar kanrne ka rahega.

I agree with you and believe that youth needs to act to make a difference to the society.

Thank you very much for your kind words.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

chalte-chalte is blog par mera aana hua.......kitni saralta,masumiyat se umra ke badhte kadmon ke saath aapke gyaan,aur saar mein parivartan hua,......pahle janna,phir seekhna,phir prashno ke daur se gujarna.....mere papa pracharya the.......nakal karte chhatra ko pakadne ki wajah se unhone apna beta kho diya..............ab to bhagwaan ki sthiti shor,dikhawe mein dayniye hai........shikshak ko guru mannewale,shikshak ki adbhut chhawi gum ho gai hai.......