रविवार, 18 दिसंबर 2022
हार-जीत
बुधवार, 23 नवंबर 2022
नैना तेरी राह में
तुझ से जो नेहा लगी, हम तो दीवाने हुए दुनिया की है ना खबर, सबसे बेगाने हुए हरपल मेरा दिल कहे, ले लूँ तुझे बाँह में
बहती हवाओं में तू, फूलों की खुशबू लगे सावन की झड़ियों से, अरमां सुलगने लगे बागों बहारों में भी, तुम ही मेरी निगाह में
------------------------------------------------- मनीष पाण्डेय ‘मनु’ अलमेर, नेदरलॅंड्स, बुधवार 23-नवंबर-2022
रविवार, 20 नवंबर 2022
राजा सोया महलों में
दर-दर भटक रही जनता मनमानी का आलम है बात नहीं कोई सुनता
ऊपर से आया फरमान बंद हुए सब दरवाजे बदल गया सबका ईमान
चाहे जाए कितनी जान उनको चेहरा चमकाना है देश हमारा बड़ा महान
यूँ विकास का काम किए हैं एंडरसन फिर भाग गया चार जमुरे पकड़ लिए हैं
मंदिर-मस्जिद बनवाते हैं रोटी कपड़ा और मकान ये तो सब छोटी बातें है
------------------------------------------------- मनीष पाण्डेय ‘मनु’ अलमेर, नेदरलॅंड्स, रविवार 20-नवंबर-2022
बुधवार, 16 नवंबर 2022
दोहरी जिन्दगी
एक जो उसे जीना पड़ता है दूसरा जिसे वो जीना चाहता है
इन दो पाटों के बीच जो फँस गया उसकी खैर नहीं
जिसे जी रहा है उसे जी पाता नहीं है जिसे जीना चाहता है वह हासिल नहीं है
बदहवासी इस उलझन की उसे कहीं का नहीं छोड़ती
बस एक तरीका है इस मिराज से छूटने का
सच का सामना!
दिक्कत इस बात की है
कि सच को
देख तो सभी सकते हैं
पर मानता कोई नहीं
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022
पहला प्यार
नदी की धार में उठते उफ़ानों की तरह
पत्तों की ओट से लुढ़कते ओस की तरह
पहली बारिस में धरती की महकती सोंधी खुशबू की तरह
पलाश के जंगलों में चटकती कलियों की तरह
रात रानी के पौधे नीचे झड़े फूलों की तरह
मोगरे के गुच्छों से उड़ती खुशबू की तरह
झरनों के कलकल से बजते संगीत की तरह
होती है दिल में दस्तक पहले प्यार की
------------------------------------------------- मनीष पाण्डेय ‘मनु’ अलमेर, नेदरलॅंड्स, रविवार १८-अक्टूबर-2022
रविवार, 16 अक्टूबर 2022
हौसला
एक मसला हल हुआ तो दूसरा है सामने, देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
लाख दीवारें उठें पत्थर-पहाड़ों से बनी, चीर सीना पत्थरों का राह कर लेती नदी मुश्किलें कितनी खड़ी हों आज तेरे राह में देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
हो भले कितनी भयावह कालिमा अंधियार की पर उसे है मात देती एक छोटी लौ कहीं इन अंधेरे में कहीं जब खो गए हों रास्ते देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
मुश्किलें आती रहें आँधी-तूफ़ानों की तरह, तू मगर डिगना नहीं ऊँचे पहाड़ों की तरह उलझनों की बोझ में जब पाँव थम जाने लगे देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
हारने और जीतने का होड़ है ये ज़िंदगी हार के भी फिर खड़ा हो है उसी की ज़िंदगी हारने का दर्द जब उत्साह को खाने लगे देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
कौन है जिसने यहाँ सन्ताप को झेला नहीं डूब कर उसमें मगर तुम भूल सब जाना नहीं टूटकर जब दर्द से ये दिल बिखर जाने लगे देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
राह रोकी पत्थरों ने, धार उसकी बाँट दी निर्झरों की चाल में संगीत पर उसने भरी जब कभी राहों के रोड़े, राह भटकाने लगे देख फिर भी हौसले का हाथ रखना थाम के
बुधवार, 5 अक्टूबर 2022
दशहरा
शुक्रवार, 30 सितंबर 2022
तेरी चाह में
बैठे हैं हम बिछाये, नैना तेरी राह में
साँसें मेरी चल रही, हमदम तेरी चाह में
तुझ से जो नेहा लगी, हम तो दीवाने हुए
दुनिया की है ना खबर, सबसे बेगाने हुए
हरपल मेरा दिल कहे, ले लूँ तुझे बाँह में
बहती हवाओं में तू, फूलों की खुशबू लगे
सावन की झाड़ियों से, अरमां सुलगने लगे
बागों बहारों में भी, तुम ही मेरी निगाह में
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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
अलमेर, नेदरलॅंड्स, 30-सितम्बर-2022
शुक्रवार, 1 जुलाई 2022
सरकार तो बना लो
सरकार तो बना लो
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नाथ या अनाथ हो
दिन हो या रात हो
नाग-नाथ को,
साँप-नाथ को
जो आ जाए मिला लो
चलो सरकार तो बना लो
कल तक विरोधी था
लगता बड़ा क्रोधी था
किसी बात पे अड़ गया है
अकेला पड़ गया है
देखो! हो सके तो इधर बुला लो
चलो सरकार तो बना लो
आगे की सीट हो
पीछे की पीठ हो
सीधा या ढीठ हो
खारा या मीठ हो
जैसे बने वैसे, काम चला लो
चलो सरकार तो बना लो
जनता की बात नहीं
रहता कुछ याद नहीं
होशियार ना बेवक़ूफ हैं
सब अपने में मसरूफ हैं
कोई भी अच्छा सा जुमला निकालो
चलो सरकार तो बना लो
चार दिन की चाँदनी
आदर्श में क्यों काटनी
मौका गँवाना क्यों
बाद में पछताना क्यों
मौका मिला है तो फायदा उठा लो
चलो सरकार तो बना लो
कुछ नहीं टिकता है
ईमान भी बिकता है
घर की जागीर है
आदमी का तो जमीर है
उधर जगा के इधर सुला लो
चलो सरकार तो बना लो
कौन यहाँ सच्चा है
जैसा है अच्छा है
हटाओ, मुद्दों को छोड़ो
पहले आँकड़े तो जोड़ो
देख लो थोड़ा हिसाब से लगा लो
चलो सरकार तो बना लो
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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
लक्सम्बर्ग शुक्रवार 01-जुलाई-2022
बदल रहा है देश
मंगलवार, 14 जून 2022
जिन्दगी
शनिवार, 4 जून 2022
बेवकूफ
शनिवार, 28 मई 2022
मैं कौन हूँ?
मैं कौन हूँ?
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उसमें बसी है
मेरी जान
किसी तोते की तरह
मैं चाहता हूँ
छुपाकर रखना
उसे दुनिया की नजर से
मेरे सिवा कोई और
उसे देख ना सके
छू ना सके
गर वो तोता है
तो फिर
मैं कौन हूँ?
प्रेम राक्षस!!
मनीष पाण्डेय ‘मनु’
लक्सम्बर्ग शनिवार 28 मई 2022
गुनाह
घण्टों बातें
करती है
मिलने आती है
जब भी पूछा
दिल का हाल तो
हँसके टाल जाती है
साथ है
पर साथ नहीं
उससे बुरी
कोई बात नहीं
ना मिले उसका प्यार
तो उससे बदतर
हालात नहीं
क्या सितम है
मेरा होके भी
वो मेरा न हुआ
सुलग रहे हैं हम
और ज़िंदगी हो गई
धुआँ-धुआँ
ना बेवफा है
और ना ही
सितमगर है
लेकिन
उसका प्यार
एक भरम भर है
इससे अच्छा तो
कह दे साफ
कोई नाता नहीं
इस तरह घुट-घुट
अब और
जिया जाता नहीं
लेकिन डरता हूँ
उसने “ना” कहा तो
क्या जी पाऊँगा?
और यदि
“हाँ” कहा तो
शायद
खुशी से मर जाऊँगा
प्यार से बढ़कर
गुनाह नहीं है
किसी भी सूरत
इसका
निबाह नहीं है
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मनीष पाण्डेय ‘मनु’
लक्सम्बर्ग शनिवार 28 मई 2022
सोमवार, 9 मई 2022
एक दिन
बुधवार, 4 मई 2022
उद्देश्य
मंगलवार, 19 अप्रैल 2022
दूरियाँ
दूरियाँ
नज़दीकियों ने दूरियाँ बढ़ाई है बड़ गई मतभेद की गहराई है
पड़ रही आवाज़ मेरे कानों पे कुछ मगर देता नहीं सुनाई है
नाम ले उसने मुझे पुकारा पर आँख में दिखती अलग परछाई है
रात के अँधियार से डरता है वो हर चिराग़ जिसने खुद बुझाई है
छत के दरकने की बात कौन करे रिश्तों में ही जब दरार आयी है
चाहता है दिल उसे पुकारूँ मैं
दम्भ ने आवाज़ पर चुराई है
क्या कहें? किसको कहाँ कैसे कहें? हमने अपनी फस्ल खुद जलाई है
दीवारों पर जो दरार तुमने देखी हाँ वही अब रिश्तों की सच्चाई है
कौन सच्चा कौन झूठा क्या पता सबने अपनी अपनी कथा बनाई है
मनीष पाण्डेय “मनु” लक्सेम्बर्ग ,मंगलवार 19-अप्रैल 2022
शुक्रवार, 18 मार्च 2022
कैसे मनाऊँ होली
कैसे मनाऊँ होली, कैसे मनाऊँ होली
छूटी वो गलियां, वो रस्ते चौबारे
यारों के संग, जहाँ फिरते थे सारे
जितना था हासिल, बहुत जान पड़ता
फाके के दिन भी, मजे से गुजारे
लड़कपन की मस्ती, ना यारों की टोली
होती नहीं अब, हँसी ना ठिठोली
कैसे मनाऊँ होली, कैसे मनाऊँ होली
मनीष पाण्डेय “मनु” लक्सेम्बर्ग,शुक्रवार 18-मार्च 2022
सोमवार, 28 फ़रवरी 2022
एलईडी बल्ब
बिलकुल
एलईडी बल्ब
की तरह हो तुम
आँखें चौंधिया देने वाली
और रंग बिरंगी
झिलमिलाहट वाली
और तो और
एलईडी की तरह ही
असर भी करती हो
दिल दिमाग पर
ना रातों में नींद आती है
और ना दिन में चैन
फर्क बस इतना है कि
एलईडी बल्ब की तरह
तुम्हारा मेटेनैंन्स
किफायती नहीं है
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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सेम्बर्ग, सोमवार 28-फरवरी-2022
रविवार, 27 फ़रवरी 2022
मुस्कान
मुस्कान
मैंने देखी है
पेरिस के म्यूजियम में लगी
मोनालिसा की तस्वीर
जिसकी मुस्कुराहट के चर्चे
सारी दुनिया में है
मुझे नहीं पता वो
क्यों मुस्कुरा रही है
लेकिन उसके मुस्कान
मुझे फीकी लगी
उस मुस्कान के सामने
जो मजदूर को
उसकी दिहाड़ी मिलने पर
जो उस सब्जी वाले
के चेहरे पर थी
जब शाम को बाजार उठाते
उसने अपने पैसे गिने
जो देखे हैं
अपने गाँव में
बच्चों के चेहरे पर
किसी के पुराने
खिलौने पाकर
उस बच्ची के चेहरे में
जिसे स्कूल जाने के लिए
उसके पिता ने
खरीद कर दी है
एक पुरानी साइकल
बुधवार, 23 फ़रवरी 2022
बदल प्यारे
बदल प्यारे
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दुनिया बहुत बदली तू भी थोड़ा बदल प्यारे
हर कदम पर धोखा है देख जरा सम्हल प्यारे
मायूस मत होना, अपने हालात के कारण
कीचड़ में भी खिलता है फूल वो कमल प्यारे
रास्ते बन ही जाएंगे, ठान ले अगर जब
खुद की बाजुओं के दम पर ही तू निकल प्यारे
खुद कर कुछ ऐसा की तेरी पहचान जुदा हो
बेकार में मत कर किसी और की नकल प्यारे
खुशियाँ और गम आते जाते हैं जिंदगी में थोड़ी सी सफलता पर इतना मत उछल प्यारे
सोमवार, 21 फ़रवरी 2022
बात
बात ----------------------------------
पूरी बात भी हर बात की, बताता नहीं कोई अपनी गलती किसी बात पे, जताता नहीं कोई
शायद लगी हो ठेस, किसी पहले की बात से
बिन बात ऐसे ही, दो बात सुनाता नहीं कोई
निकल आयी होगी तुमसे, गरज किसी बात की
बे मतलब किसी को, प्यार से बुलाता नहीं कोई
बातों से खानदानी, वो लगता है आदमी
किसी से यूँ ही अदब से, पेश आता नहीं कोई
सर्दियों की फिक्र होगी, मन में उसके शायद
वर्ना दरख्त इतने, फिजूल लगाता नहीं कोई
आदमी वो भीतर ही, बड़ा ख़ुशमिज़ाज होगा
यूँ ही किसी की बात पे, मुस्कुराता नहीं कोई
सोमवार, 14 फ़रवरी 2022
सच्चा-झूठा
सच्चा-झूठा
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माना कि जो दिखता है वही बिकता है
लेकिन
यह जरूरी नहीं
जिसे मोल लेकर आये
वही हो जो
दिखाया गया था
आँखों देखी
और कानों सुनी बात भी
गलत हो सकते हैं
आँखों देखी के भरोसे ही
दुर्योधन पानी में जा गिरा
और भारत भूमि
खून से नहा गयी
और कभी
कानों सुनी के कारण ही
राम राज में भी
सीता ने वनवास भोगा
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रविवार, 13 फ़रवरी 2022
पहेली
पहेली
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हर भेद मन के जानती
सुख-दुख की मेरी साथी
भावना मेरी समझती
एक वो सच्ची सहेली
भाव देकर व्यक्त करती
चित्त की हर इक व्यथा को
या कभी आलम्ब देती
थाम कर मेरी हथेली
जब दुखों का ताप बढ़ता
आस की बरखा बने वो
या मरीची कभी बनकर
छाँट देती है कुहेली
आप ही बनती चले वो
या कभी बिलकुल न बूझे
छोटी बच्ची के जैसे
करती रहती अठखेली
क्या लिख रहा हूँ मैं उसे
या वह मुझे है लिख रही?
ना समझ पाया अभी तक ये कविता है कि पहेली
शनिवार, 12 फ़रवरी 2022
समझो बसंत आया
जाड़े की ठिठुरन अब जाने लगी है हरी-भरी धरती भी इतराने लगी है माघी के मेले में यारों ने मिलने बुलाया समझो बसंत आया, समझो बसंत आया
खेतों में तिलहन और मेढ़ों पे दलहन
सरसों की पिंवरि में धरती है दुल्हन
गन्ने के खेतों में भालू ने डेरा जमाया
समझो बसंत आया, समझो बसंत आया
टेसुओं की खुशबू भरने लगी हवा में
सिंदूरी की मस्ती छाने लगी फिजा में
जब अमिया की डाली पे बौर लहराया
समझो बसंत आया, समझो बसंत आया
बाड़े में इमली और बेरी पकने लगे हैं
कच्ची कैरी के घेर अब लटकने लगे हैं
गिलहरी ने अमरूद पर उत्पात मचाया
समझो बसंत आया, समझो बसंत आया
कोयल की कुहू से गूंजे है उपवन
महुए के फूलों से बहका सा तन-मन
बगिया में भौरों का झुण्ड मंडराया
समझो बसंत आया, समझो बसंत आया
सोमवार, 24 जनवरी 2022
ट्रेजेडी
अरस्तू के लिखे
पोएटिक्स के हवाले से कहो
या कालिदास रचित
अभिज्ञान शाकुंतलम् के नाम पर
चाहे वो
कबीर के दोहे हों
या बात निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब के कलाम पर
तुलसी की चौपाई हो
या नुक्ता-चीनी हो
निराला-अज्ञेय के काम पर
बात बस इतनी सी है,
सिर्फ खुशियों और
जीत के सहारे
कहानी नहीं चलती है
ट्रेजेडी केआने से ही
ज़िदगी
मुकम्मल होती है
और एक कविता बनती है