मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

चाँद

चाँद 
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चाँद भी 
बहरूपिया
और छलिया है 

कभी तो
प्रेमिका के
सुन्दर मुखड़े सा 
दिख जाता है 
या कभी
उसकी याद में 
दिल में
टीस जगाता है 

कभी तो 
चौथ की पूजा के समय 
बादलों में
छुपकर सताता है 
तो कभी अँधेरी रात में 
राहगीरों को
राह दिखाता है 

कभी तो 
दादी की कहानी में 
पीपल के पेड़ वाले 
भूत को जगाता है 
तो कभी 
शरद पूनम की रात में 
खीर को 
अमृत बनाता है 

कभी तो 
चंदा मामा बनकर 
बच्चों को दो निवाला 
और खिलाता है 
तो कभी दूर का 
खिलौना बन 
बच्चों को ललचाता
रुलाता है 

चाँद भी 
जाने कितने 
रूप दिखाता है 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, मंगलवार 29-दिसम्बर-2020

बरसात

बरसात 
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कभी कभी सोचता हूँ 
ये बरसात भी ना 
जाने कितने 
तरह की होती है 

जब बरसती है 
बिछुड़े प्रेमी 
नैनों से 
तो उसके जलते
अरमानों को
और दहकाती है 
लेकिन जब गिरे 
धरती पर 
वर्षा की
फुहार बनकर तो 
तो मिट्टी की सौंधी
खुशबू फैलाती है 

जब बरसती है 
जेठ की दुपहरी में 
सूरज से आग
तो बूढ़े किसान के
दिल में 
हूक उठाती है 
और जब होती 
सावन में  
बादलों से बरसात 
तो खेतों में फसलें 
उगाती है 

कभी तो 
पिताजी के गुस्से में
झिड़कियों 
की होती है बरसात 
तो कभी 
माँ की ममता में
बरसती है 
दुलार की सौगात 

कभी 
ऊपर वाले की 
कृपा से होती है 
खुशिओं की बरसात 
तो कभी 
मुशीबतों की बारिस में 
बिगड़ते हैं हालात

कभी बरसात  
का पानी
बहा ले जाता है पूरा गांव
तो कभी 
स्कुल में कराता है छुट्टी
ताकि बच्चे चला सकें 
कागज की नाँव 

बरसात 
तुम्हारी बात गजब है 
छठा निराली है 
तुम्हारे आने से 
कहीं दुःखों का सैलाब 
तो कहीं छा जाती 
खुशहाली है 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, मंगलवार 29-दिसम्बर-2020

आँसू

आँसू 
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आँसू
की बात भी 
एकदम निराली है
और 
रँग-बिरँगी हैं 
उसकी छटाएँ 


आँसू 
वो शय है 
जो अमीर-गरीब 
काले-गोरे, और
बड़े-छोटे में 
भेद नहीं करता

आँसू 
भाँप लेता है
दिल की 
गहराईओं में छिपे 
तड़प को 
और चुपके से 
आकर बैठ जाता है 
पलकों की छोर पर
हमारा दुःख बाँटने 

आँसू 
ताड लेता है 
हमारी खुशी 
और छलक पड़ता है 
नैनों की कोर से 

आँसू 
न जाने कैसे 
जान लेता है 
लाडली बिटिया के  
बिदाई का पल 
और 
भर जाता है  
बाबुल के नैनों में

आँसू 
जब लुढ़कता है 
बच्चे की आँखों से 
तो माँ के दिल को
कचोटता है 
और जब 
सुनता है 
पिता की डाँट 
तो कर देता हैं 
आँखे लाल 
 
आँसू 
जागता है रात भर 
हमारे साथ 
और बन जाता है
सावन की झड़ी 
किसी की याद में

आँसू 
कभी तो 
डबडबाई आँखों में 
मोतियों सा चमकता है 
या फिर कभी तो 
दहकता है लावे जैसा 


आँसू 
जब निकलता है
पश्चाताप की ज्वाला में 
पिघलकर 
तो धो देता है 
हमारी गलतियाँ 

आँसू 
एक ऐसा 
सच्चा साथी है 
जो सुख और दुःख 
दोनों में
साथ निभाता है
एक बराबर 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, मंगलवार 29-दिसम्बर-2020

शनिवार, 21 नवंबर 2020

सिमट रहे हैं

रोज मर्रा के
काम काज
निपटाते-निपटाते
जिन्दगी के
हंसी लम्हे
निपट रहे हैं  

सुविधाओं से
लिपटने की होड़ में
अकेलापन और 
अवसाद
लिपट रहे हैं 

जिन्दगी तो
भाग रही है 
बेतहाशा
लेकिन 
दिल के अरमान
घिसट रहे हैं 

छूने की चाहत में 
चाँद सितारे 
पीछे छोड़ आये 
उन्हें जो 
मन के 
निकट रहे हैं 

बढ़ रहा है 
ऑनलाइन अवतार का 
दायरा 
पर दिल से जुड़े 
सच्चे रिश्ते 
धीरे-धीरे
सिमट रहे हैं 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, शनिवार 21-नवम्बर-2020

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

दशहरा

दशहरा
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हर दशहरा-
जब जलता है
रावण का पुतला,
मनाता तो
मैं भी हूँ उत्सव-
बुराई पर अच्छाई के
विजय का!

लेकिन,
भीतर ही भीतर
रहता हूँ थोड़ा 
डरा- डरा,
क्यों? 
अरे! आप पूछते हैं 
क्यों भला?

मन में नहीं है मेरे
कौन सा विकार?
स्वारथ का तो
नहीं कोई पारावार,

बिना कुछ किए ही
अहं इतना 
कि खुद रावण
लजा जाए,
रखता हूँ द्वेष
जरा सी कोई बात 
यदि बुरी लग जाए,

झूठ तो मैं
यूँ ही बोल जाता हूँ
बात-बिना-बात,
कब छोड़ा
कोई सुख कोई साधन
मान कर अपने 
पिता की बात,

दोष अपनी
गलतियों का 
भाग्य पर मढ़ता हूँ.
और थोड़ा सा कुछ
भला कर दिया तो
जाने कितना 
दम्भ भरता हूँ,

राम के नाम पर
जताता हूँ
अपनी भक्ति,
पर नहीं उनके 
किसी मर्यादा को
निभाने की शक्ति,

रावण के पुतले
हम सभी हमेशा
बनाते-जलाते हैं,
लेकिन अपने दोष
और अपनी कमियाँ
कभी देख नहीं पाते हैं

किस मुँह से दूँ
विजयादशमी की बधाई,
जब आज तक
मिटा न सका 
अपनी एक भी बुराई?

कृपा निधान से
बस इतनी है
विनती,
रखे दया दृष्टि 
और क्षमा करे 
गलती,

हो सके तो 
इस बार दशहरा
कुछ ऐसे मनायें,
सुख-दुःख बाटें
सभी से और
दिलों से दिल मिलायें 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, रविवार 25-अक्टूबर-2020

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

सब बेकार!

सर 
झुक गया है
शर्म से
क्योंकि
फिर एक बेटी
आज हुई शर्मसार,


अपने ही गाँव
गली, घर में 
दरिंदों ने कर डाली 
उसकी आत्मा
तार-तार,

ऐसा क्यों होता है
बार बार?
कानून है-
लेकिन सब बेकार,
समाज है-
लेकिन
उसको  नहीं 
नहीं सरोकार,

कोई कहता है  
कपडे पहनने का 
नहीं है ढंग
और 
लड़की के
अच्छे नहीं संस्कार,

फिर कहते  हैं 
क्यों घूमती है 
सिनेमा और पार्क में 
लड़कों को
बना के यार,

और अब?
अब कह रहे हैं 
सिखाओ आत्मरक्षा 
और 
लड़कियों के हाथों में 
दे दो हथियार,

नहीं डरेगी 
किसी से
फिर जब 
कोई आएगा पीछे
तो भगा देगी 
उसको मार,

मुझे  
हंसी आती है 
इन बचकानी 
बातों पर 
जिसका 
सच्चाई से
नहीं कोई सरोकार,

अरे!
ये तो बताओ
कैसे सिखाओगे 
छह महीने की
दूधमुहि बच्ची को 
करना
दुष्टों का प्रतिकार?


कैसे लड़ेगी 
पत्थर और डण्डे से 
बन्दूक पकड़े
लफंगों के साथ 
जो मिलके
आये हैं चार?

और उनको क्या 
सिखाओगे 
जब हैवानियत होते 
समय 
पास खड़े थे
माँ-बाप, भाई 
लाचार?

फिर उन
उम्र-दराज़ 
महिलाओं को 
क्या सिखाओगे 
होता है 
जिनके अस्मिता 
पर वार?

कौन सा पैंतरा 
सिखाओगे 
उस लड़की को 
जिसे आरोपी
जिन्दा जला देता है 
सरे बाजार?

अरे कुछ तो 
खुद भी
करके दिखाओ,
कब तक?
आखिर कब तक 
बेटिओं को ही
ढहराओगे 
हर बात के लिए
जिम्मेदार?

कब जायेगा
तुम्हारा ध्यान
असली समस्या पर 
और कब सिखाओगे
अपने लड़को को
सही आचार?

क्यों नहीं बदलते 
उसकी सोच 
और 
लड़कियों के प्रति 
उनका रवैया- 
उनका व्यवहार?

सब बेकार!
जब तक 
बदलेगी नहीं
हमारी सोच  
तब तक, 
ये बातें हैं सब बेकार!

सब बेकार!
तब तक, सब बेकार!

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, रविवार 18-अक्टूबर सितंबर-2020

सोमवार, 28 सितंबर 2020

हेंड्रिक मार्समान और हॉलैंड की स्मृतियाँ

सन् 1999 में नीदरलैंड्स की दो संस्थाओं "पोएट्री इंटरनेशनल" और "आर.एन.डब्लू।"  ने एक सर्वेक्षण के जरिए बीसवीं सदी की महान डच कविताओं का चयन किया उसमें से एक थी हेंडरिक मार्समान की लिखी कविता "हेरिनरिंग आन होलाण्ड" जिसके शीर्षक का हिंदी अनुवाद होता है "हॉलैंड की स्मृतियाँ"| 

हेंडरिक मार्समान बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण डच कवियों में से एक थे| वे पेशे से वकील लेकिन उन्होंने ने साहित्य के प्रति समर्पित भावना रखी और वे कवि होने के साथ ही प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच एक प्रभावशाली आलोचक और संपादक बने। उनके लेखन में परम्परागत यूरोपीय संस्कृति के प्रति एक अनूठा आकर्षक दिखता है पर उनकी शैली मुखर और स्वतंत्र सोच लिए होती थी| सन् 1918 में उनकी पहली कविता स्ट्रोमिंघेन (Stroomingen) नाम की में छपी और 1920 उनका पहला कविता संग्रह छपा| सन् 1925 में De Vrije bladen (“मुक्त पत्रकारिता”) के संपादक बने और प्रभावशाली युवा साहित्यकारों में शुमार हुए| मात्र 20-22  साल के लेखन के में उन्होंने 27 किताबें लिखीं जिनमें से 3 उनके मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई| उनकी लिखी कविता नीदरलैंड्स के "लाइडेन" और जर्मनी के की राजधानी "बर्लिन" में दीवार पर उकेरी गयी हैं| 

मार्समान का जन्म 30-सितम्बर-1899 को 'जेइस्त' नाम के एक छोटे से कसबे में हुआ जो निदरलैण्ड्स के मध्य क्षेत्र के एक प्रमुख शहर उत्रेख्त के पूर्वी छोर में बसा है| जो लोग हॉलैंड के भूगोल को नहीं जानते उनके लिए यह कहना उचित होगा कि उनकी जन्मस्थली एम्स्टर्डम से कुछ 60 किमी की दूरी पर है| 

'हेंडरिक मार्समान' नाम से मेरा परिचय तब हुआ जब मैंने एम्स्टर्डम से 30 किमी दूर एक शहर "अल्मेर" में रहने गया| भारत की तरह ही, निदरलैण्ड्स में भी शहर के हिस्सों को किसी न बस्ती के नाम से जानते हैं| अल्मेर शहर के जिस हिस्से में मेरा घर है उसका नाम है- "लिटरेचर वाइक" जिसे हिंदी में "साहित्यनगर" के जैसा कह सकते हैं| विशेष बात यह कि इस नाम के अनुरूप हमारे मुहल्ले के सारी गलियों के नाम दुनिया भर के और विशेषतः डच या यूरोपियन साहित्यकारों के नाम पर रखे गए हैं| आप समझ ही गए होंगे कि हमारी गली का नाम उनके ही नाम पर रखा गया है- "हेंडरिक मार्समानस्त्रात"| 

साहित्य के प्रति प्रेम ने मुझे उनके नाम और काम के विषय में खोजने के लिए प्रेरित किया और तब मुझे उनकी अमर कविता "हॉलैंड की स्मृतियाँ" के विषय में पता चला| यह कविता उन्होंने १९३६ में लिखी थी जब वो अपने लेखन और व्यवसाय के चलते हॉलैंड से निकल कर यूरोप के अन्य देशों में रह रहे थे| 

उनकी ये कविता कई भाषाओँ में अनुवादित हुई है जिनमें से एक है आयरिश कवि 'माइकल लोंगले' द्वारा सन् 1939 में किया गया अंग्रेजी अनुवाद| मैंने उसी कालजयी कविता का हिन्दी अनुवाद करने का प्रयास किया है| हेंडरिक मार्समान लिखते हैं: 

हॉलैंड की याद आने से 
उभरते हैं दृश्य 
उसकी चौड़ी नदियों के
जो बहती हैं तराईयों में
अनंत तक, 

[नीदरलैंड का अधिकांश भाग समुद्र तल से नीचे राइन-मूस-स्कैल्ट के मुहाने पर बसा है और पुरे देश में बड़ी नदियों की जाल बिछी हुई है| मार्समान इसे ही याद करते हैं इस पद में ]

अनमने खड़े
विचित्र से पतले
चिनारों की 
लम्बी कतारें
और उन पर छायी
कोहरे की परतें 
जो बिखरी हुई हैं 
क्षितिज पार तक,

[पतले और ऊँचे चिनारों से पूरा देश भरा हुआ है और ऋतु परिवर्तन के समय अकसर कोहरे से भरा मौसम होता है सुबह के समय जिसका वर्णन मिलता है इस पद में]

दूर कहीं दिखाई पड़ते
छोटे-छोटे निर्माणों 
की झलकियाँ 
जो फैली हैं
सुदूर ग्रामीण प्रदेशों तक,

[आज भी जब आप महामार्ग से जाएं तो दूर दूर में छोटे-छोटे भवन आदि दिख जाते हैं फिर यह कविता तो 1936 की है तो अवश्य तब काम ही घर रहे होंगे जो दूर दूर में बनाये गए होंगे ]

पेड़ों के झुरमुट,
गाँव और बस्तियां,
ठिंगने से मीनार,
भव्य चर्च और
उनकी आहातों में लगे
एल्म के पेड़
जो उसकी शोभा  
को और बढ़ाते हैं,

[बाकि पश्चिमी यूरोप के देशों के सामान ही नीदरलैंड्स में भी हर शहर में चर्च हैं और बड़े शहरों जैसे देन बोश, मास्त्रिक, हेग आदि शहरों में भव्य चर्च आज भी देखते ही बनते हैं ]

झुका हुआ आसमान,
और कुहासे के
बीच से झांकता 
धूसर मोती सा
दिखाई देता सूरज,
जैसे मोतिओं का राजा*,

[मार्समान ने बादलों से ढके आसमान को झुके हुए आसमान की संज्ञा दी और कुहासे से झाँकते सूरज के धूसर रंग को भी मोती सा लिखा है| सर्दी के मौसम में यह मनोरम दृश्य हमेशा ही देखे पड़ती है] 

और बस्ती-बस्ती में
पानी की
चेतावनी भरी आवाजें
शायद किसी विपत्ति
की आहट से 
डरी-सहमी हुई| 

[मार्समान ने जब यह कविता लिखी वो प्रथम विश्वयुद्ध के बाद और द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच का समय था| उन्होंने इन पंक्तियों में पानी के थपेडों को तब के उहापोह से जोड़कर बहुत ही खूबसूरती से चित्रित किया है]

* उन्होंने जननी लिखा है

इस कविता में अपनी मातृभूमि की स्मृतियों के साथ भविष्य के प्रति मार्समान के मन में चल रहे उहापोह की स्पष्ट झलक मिलती है जो उनके साहित्य में प्रमुखता से परिलक्षित रही| और उनकी कुशंकाओं के अनुरूप ही उनकी मृत्यु केवल 40 वर्ष की आयु में 20 और 21-जून-1940 की अभागी रात को फ़्रांस से इंग्लैंड की समुद्री यात्रा के दौरान "बिस्के की खाड़ी" में हुई| 

तब तक द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ चुका था और वे "एस एस बेरेनिस" नाम जहाज में सवार होकर फ़्रांस से भाग कर इंग्लैंड शरण लेने जा रहे थे| उस जहाज में 47 लोग सवार थे जिसमें उनकी पत्नी भी थी जो भाग्य से बच निकले ८ लोगों में से एक थी| उस जहाज के डूबने के विषय में दो सम्भावित कारन बताये जाते हैं - या तो उसके इंजिन में कुछ तकनिकी खराबी के कारन विस्फोट हुआ या कि जर्मन युद्धपोत का निशाना बन गया जिसने उस जहाज को एक सामरिक जहाज समझकर मार गिराया| कारन चाहे जो भी पर इस दुर्घटना ने यूरोप के इस महान युवा साहित्यकार को असमय ही हमसे छीन लिया| 

उनकी पहली किताब छपने की शताब्दी बीत जाने के बाद भी हेंडरिक मार्समान अपनी कविताओं और साहित्य के बलबूते अपने पाठकों और प्रशंसकों के दिलों में हमेशा हमेशा अमर रहेंगे| 

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, रविवार 27-सितंबर-2020

स्रोत:

१) http://4umi.com/marsman/herinnering
२) https://en.wikipedia.org/wiki/Hendrik_Marsman
३) https://web.archive.org/web/20100622000914/http://www.nrcboeken.nl/recensie/denkend-aan-komrij
४) https://www.dbnl.nl/auteurs/auteur.php?id=mars005
५) https://www.britannica.com/biography/Hendrik-Marsman

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

विद्रोही

साहित्यकार तो अपने आप में
सत्ता का शाश्वत विपक्ष होता है
आँखे मूँद भाण्ड बन जाए तो
इतिहास खून के आंसू रोता  है 

कवि कुमार विश्वास के मुँह
मैंने कहीं कभी सुनी ये बात
थी अच्छी लगी दिल को मेरे
इसलिए रह गयी मुझे याद 

यूँ मैं भी खुद को अकसर
विपक्ष में ही खड़ा पाता हूँ
भीड़ से अलग चलता हूँ
सो "विद्रोही" कहलाता हूँ 

कांग्रेस ने बहुत दिनों तक
यही शातिर चाल चला है
वर्ग विशेष की तुष्टि कर
सचमुच में देश को छला है 

पर पधारे हैं जो अब की बार 
उनकी भी तो छटाएँ अलग हैं
डूबे अर्थव्यवस्था, मरे मजदूर
पर दोष न लगे पुरे सजग हैं 

जी ऐसा नहीं  है कि मैं सिर्फ
दूसरों पर ही उंगली उठाता हूँ
खुद की समीक्षा भी करता हूँ
तभी रात बेफिक्र सो जाता हूँ

सोमवार, 21 सितंबर 2020

कहावतों की उलझन

कहावतों की उलझन 
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कहावतें भी कभी-कभी 
बात समझाने के बदले 
उलझन बढ़ाते हैं,
आप नही मानते 
तो चलिये
आपको 
कुछ कहावतें
सुनाते हैं| 


जो कहते हैं 
ईश्वर है
सबका रख वाला,
तो फिर क्यों कहते हैं 
भूखे भजन 
न होए गोपाला?  


जब काजल की 
कोठरी में जाने से 
हाथ
हो जाते हैं काले,
तो साँपों से लदे
चन्दन 
की लकड़ी 
क्यों नहीं बनते 
विष वाले?


वो कहते हैं 
मीठा बोलो 
और न दुखाओ 
दिल किसी का,
तो फिर
क्यों कहते हैं 
भावनाओं को देखो 
और भूल जाओ 
उसके शब्द
और तरीका? 


जो कहते हैं 
ऊपर वाला 
सब देखता है भाई, 
तो फिर क्यों कहा 
समरथ को 
नहीं दोष गोसांई? 


अजी छोड़िए,
ये उलाहने  भी 
अपनी सुविधा से
बनाए जाते हैं,
जहाँ जैसा हो मौका
वैसे तीर
चलाये जाते हैं|


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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, सोमवार 21-सितंबर-2020

रविवार, 20 सितंबर 2020

कुछ दोहे

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बिटिया घर से हो विदा

अजब बनी यह रीत

माँ-बाबा कैसे सहें

बिछुड़े उनकी प्रीत


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गुरु वंदना में पहला दोहा:


महिमा वेद-पुराण भी, जिनकी करें बखान

गुरु के बिन मिलता नहीं, जग में कोई ज्ञान


श्याम नाम मीरा भजे, 

सबरी जपती राम

वे ही सागर प्रेम के,

वे ही पूरन काम 


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रक्षाबंधन के लिए मेरा प्रयास:



रेशम डोरी प्यार की, बाँध कलाई आज

भाई से बहना कहे, रखना इसकी लाज


और


रेशम प्रेम प्यार का, बँधा कलाई आज

भाई को ऐसा लगे, मिला स्वर्ग का राज

सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिन्दी?

 हिन्दी?
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हिन्दी तो 
उस गरीब माँ की तरह
अभागन हो गयी है 
जिसके बच्चे
पढ़ लिख कर 
जब ऊँचे रहन सहन का
हिस्सा बन जाते हैं,
फिर तो सबके सामने 
अपने माँ-बाप के 
पैर छूना तो दूर 
उनसे बात करने से भी
कतराते हैं| 

 
हिन्दी? 
हिन्दी तो
उस गाँधीवाद के समान 
एक ढकोसला
बन गया है
जिसके गुण तो
बढ़ाचढ़ा कर
सभी गाते हैं
वाह-वाही
लूटने के लिए,
लेकिन अपनाता
कोई नहीं| 


हिन्दी?
हिन्दी तो
सनातन धर्म के 
उन मूल्यों के समान
हो गयी है,
जिसके नाम पर 
विश्व-गुरु होने की 
बात तो सभी करते हैं
लेकिन 
उसके परम्पराओं और
संस्कारों को
पुराने और
दकियानूसी सोच का
हिस्सा मानकर
उसका पालन 
खुद नहीं करते| 


यदि ऐसा नहीं है
तो क्यों
पितृपक्ष में 
किये जाने वाले
मातृ-नवमी के 
वार्षिक तर्पण के समान 
बस एक दिन 
"हिन्दी दिवस" मनाकर 
हम अपने कर्तव्यों 
की पूर्ति मान लेते हैं? 


क्यों हिन्दी
हमारे रोजमर्रा 
का हिस्सा नहीं है?
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मनीष पाण्डेय “मनु” लक्सम्बर्ग,
हिन्दी दिवस सोमवार 14-सितंबर-2020

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

ये तो चीटिंग है

ये तो सरासर चीटिंग है विधाता
भला है कौन ऐसे रिश्ते निभाता 


तुमने कहा था तुम रक्षक हो मेरे
छाया तुम्हारी होगी साँझ सवेरे 
बादल दुखों के न कभी मुझको घेरे
हमेशा रहोगे तुम जो साथ मेरे 
कैसे तो फिर यूँ मुसीबत है आता
ये तो सरासर चीटिंग है विधाता


पत्ता ना डोले बिना तेरी मर्जी
फिर क्यों भला छाई इतनी खुदगर्जी
लोगों को ठगते बने बाबा फर्जी
सुनो तो हमारी लगाते हैं अर्जी
लालच में आदमी कुछ भी कर जाता
ये तो सरासर चीटिंग है विधाता


दिया दे करम जो मेरे हाथ में है
क्यों परिणाम भी फिर नहीं साथ में है
मेहनत गरीबों की दिन रात में है
भरे जेब सेठों की हर बात में है 
करें भी तो क्या कुछ समझ नहीं आता 
ये तो सरासर चीटिंग है विधाता


भलाई से हमेशा होता ना भला
सच्चाई तो जाने किस कोने डला
चलके भी राह सीधे नहीं कुछ मिला
बस जीते वही जो दांव उलटे चला
हेल्दी खाने से स्वाद नहीं आता
ये तो सरासर चीटिंग है विधाता

==============================
मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, गुरुवार 03-सितंबर-2020

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

अच्छा हुआ

 हे! भरत,
अच्छा हुआ
तुम तब आये,
आज आते
तो
राम को 
वन भेजने का
सारा षड्यंत्र
तुम्हारा ही 
माना जाता।


हे! कुन्ती,
अच्छा हुआ 
तुम तब आयी,
आज आती
तो विपक्षी 
सीधे तुम्हें 
बंदी बनाके 
तुम्हारे बेटों की
कलाइयाँ
मरोड़ देते।


हे! प्रह्लाद,
अच्छा हुआ 
तुम तब आये,
आज आते तो
तुम भक्तराज
नहीं
अपने पिता के
प्राण हंता
कहलाते।


हे! सुदामा,
अच्छा हुआ
तुम तब आये,
आज आते तो
बाहर खड़ा
दरबान ही
तुम्हें टरका देता।


हे! अंगद,
अच्छा हुआ
तुम तब आये,
आज आते तो 
युवराज नहीं
बंदी 
बनाया जाते।


हे! दूर्वासा,
अच्छा हुआ
तुम तब आये,
आज आते तो
ऋषि मान
पूजे नहीं
लताड़े जाते।


मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, १४-अगस्त-२०२०

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

अपना पराया

 सटीक उत्तर,
करारा जवाब
किसे दें?
कौन अपना है?
कौन पराया?

अर्जुन ने
गुरुओं पर
तीर चलाया,
दुर्योधन ने
अपने ही
कुल दीप को
माँद में बुझाया।

सुग्रीव ने
किसी और के
कन्धे से बाण चलाया
विभीषण ने
अपने घर का
सब भेद
आक्रांता को बताया।

आपस में फूट ने
मुग़लों को
बनाया शहंशाह
और
अंग्रेजों ने
ले जाने
लूट का सामान
खोले बन्दरगाह।

आँख के बदले
निकालोगे
आँख
तो दुनिया
हो जाएगी अंधी।
और
संकुचित विचारों से
अपनी ही आत्मा
ना बनाओ
बन्दी।

किसकी कहें?
हमाम खाने में
सभी हैं
नंगे,
नहीं मिलता
स्नान का पुण्य
जब बस
गिर जाने से
कहो
हर हर गंगे।

मन को
करो साफ़
और ख़ुद के
अंदर झांक,
निकालो एक रचना,
गीत, गजल
कोई मुक्तक
या दोहा।

हम भी पढ़ेंगे,
सीखेंगे और
वाह कहेंगे।

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मनीष पाण्डेय, "मनु"
अलमेर, नीदरलैंड्स, गुरुवार 13 अगस्त 2020

अटल कीर्ति

 था दुश्मन बैठा ताक में
वे नोबेल के फ़िराक़ में

बस में बैठ गए जाके
जनता मूरख बन ताके

ध्यान जो भटका लीडर का
वही है मौक़ा गीदड़ का

अंधेरे में करके सीमा पार   
आया कारगिल के द्वार

पीठ में खंजर जो घोंपा
समझ में आया तब धोका

देश की आन बचाने को
दुश्मन को मार भगाने को

जहां पर जम जाती है हाड़
वहाँ पर अपना झंडा गाड़

बढ़ाई भारत माँ की शान
शीश दे वीरों ने बलिदान

लड़े हैं और लड़ेंगे हम
दाँत खट्टे करेंगे हम

दुश्मन भी जाने है ये बात
तभी तो छुपके करता घात

अगर तुम खोए ना होते
माँओं के पूत नहीं खोते

मगर तुम भी भारत के लाल
इसलिए कहता बात सम्हाल

तुम्हारे जैसे नेता आज नहीं
कुर्सी को लड़ते लाज नहीं

कवि हृदय था कोमल मन
करता हूँ तुमको आज नमन

करते थे राजनीति निश्छल
है कीर्ति तुम्हारी सदा अटल

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मनीष पाण्डेय, "मनु"
अलमेर, नीदरलैंड्स, गुरुवार 13 अगस्त 2020

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

राहत इंदोरी को श्रधांजलि

राहत इंदोरी को श्रधांजलि

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यूँ बेरुख़ी से अपना दामन छुड़ा के चला जाएगा

सोचा नहीं था वो इस तरह दिल दुखा के चला जाएगा


यू तो रोज़ जाने कितने लोग जाते हैं इस जहान से

क्या पता था वो एक ज़लज़ला उठा के चला जाएगा 


उसकी ग़ज़लों ने सिखाया ग़मों में भी मुस्कुराना

हम न समझे थे वो एक दिन रुला के चला जाएगा


मालूम था महफ़िल से होगा रुख़सत वो एक दिन

ये तो नहीं था कि भीड़ को तनहा बना के चला जाएगा 


उसके होने से लिया करते थे हम राहत की साँस 

मालूम न था वो दिलों में सुराख़ बना के चला जाएगा 


————————

मनीष पाण्डेय, लक्सम्बर्ग

११-अगस्त २०२०

रविवार, 2 अगस्त 2020

हिंदी प्रेमियों के नाम लक्जमबर्ग की पाती

हिंदी प्रेमियों के नाम लक्जमबर्ग की पाती

लक्समबर्ग पश्चिमी यूरोप का एक छोटा सा देश है जिसका नाम अपनी राजधानी यानी लक्समबर्ग शहर के नाम पर है। इस देश का पूरा नाम “ग्रैंड डची ऑफ लक्समबर्ग” है और दुनिया में एकमात्र ग्रैंड डची है।

मध्यकालीन युग में लक्समबर्ग सामरिक रूप से एक महत्वपूर्ण देश रहा है। लक्सेम्बर्ग का किला चौदहवीं शताब्दी में उत्तर पश्चिम का सबसे मजबूत किला माना जाता था और सन् 1354 में इसी किले के आस पास के क्षेत्र को मिलाकर “लेट्ज़ेबर्ज” की स्थापना हुई जिसे जर्मन, फ्रेंच आदि भाषा में लक्सेम्बर्ग कहा जाता था।

जैसे अट्ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के भारत में लगभग एक हज़ार छोटे-बड़े रिसायत थे उसी तरह लक्सेम्बर्ग भी उत्तरी-पश्चिमी यूरोप का एक छोटा सा रियासत था जो बाद में बरगंडी-नेदरलॅंड्स के सत्रह प्रांतों में से एक बना। इस क्षेत्र को हमेशा से ही तराई वाले देशों या ‘लो कन्ट्रीज’ के नाम से बुलाया जाता था।

बहुत से लोग लक्सेम्बर्ग के झंडे और इसके राष्ट्र गान का नाम “दी विल्हेल्मूस” होने के कारन भ्रम में पड़ जाते हैं और ये बिना कारन नहीं है। लक्समबर्ग पहले नीदरलैंड के अधीन ही हुआ करता था। नेपोलियन के पतन के बाद सन् 1814-15 में  वियना में सभी युरोपियन राजनितिक परिवारों की बैठक हुई जिसे कांग्रेस ऑफ़ वियना के नाम से जाना जाता है। इसी बैठक में नेदरलॅंड्स की स्थापना हुई और “हाउस ऑफ़ ऑरेंज” के विल्लियम अलेक्सेंडर प्रथम को इसका राजा बनाया गया।  इस डच राजधानी के तहत वर्तमान नेदरलॅंड्स, बेल्जियम, लक्समबर्ग और जर्मनी के बिटबर्ग का क्षेत्र आता था।

लक्समबर्ग के अलग देश बनने की भी अजब कहानी है। 1890 में जब नीदरलैंड के राजा ऐलेग्ज़ैंडर तृतीय की मृत्यु हुई तब उनकी संतान एक बेटी थी और तब ग्रैंड डची ओफ लक्समबर्ग के कार्यकारी राज्य संस्था के सदस्यों ने एक महिला को रानी स्वीकार नहीं किया और इसके परिणाम स्वरूप लक्समबर्ग को एक अलग देश की मान्यता मिली। यही कारण है कि इसका झंडा नेदरलॅंड्स के झंडे के गहरे नीले रंग को हलके और आसमानी नीले रंग से बदलकर बनाया गया है।  

यह देश पश्चिम और उत्तर में बेल्जियम, पूर्व में जर्मनी और दक्षिण में फ्रांस से घिरा हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल ढाई हजार वर्गफुट है और कुल जनसख्या लगभग साढ़े छह लाख है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों को देखें तो यह देश प्रतिव्यक्ति आय के मामले में दूसरे नम्बर पर है। यूरोपीय संघ की कुल चार राजधानियाँ हैं जिसमें से ब्रुसेल्स को तो सभी जानते हैं पर फ्रेंकफर्ट और स्ट्रासबर्ग के लक्समबर्ग भी एक राजधानी है और यहाँ यूरोपीय संघ का मुख्य न्यायालय स्थित है।  

लक्समबर्ग यूरोप के बहुत आधुनिक देशों में से एक है। हमेशा कुछ नया करने वाले इस देश का ध्येय वाक्य या मोटो है - “मीर वेल ब्लाईव वाट मीर जिन” मतलब “मैं जैसे हैं वैसे बने रहेंगे।”
 
इसके विपरीत, यहाँ के लोग अवसर का सही लाभ लेना जानते हैं और आगे बढ़ने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। इस छोटे से देश ने पहले बेनेलक्स फिर यूरोपीय संघ के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। ओईसीडी, यूनाइटेड नेशंस और नाटो के भी संस्थापक सदस्यों में से है। लक्समबर्ग की कुछ झलकियां -

यूरोप देशों के वीजा को शेंगेन वीजा कहते हैं और ये शेंगेन लक्समबर्ग के ही एक गांव का नाम है जहाँ यूरोपीय संघ के निर्माण की बैठक हुई थी
वैसे तो लक्समबर्ग में तीन आधिकारिक भाषाएँ हैं लक्समबर्गीस, फ्रेंच और जर्मन लेकिन सभी को अंग्रेजी भाषा भी आती है
यहाँ के लगभग आधे (49 %) निवासी प्रवासी हैं जिनमे अन्य यूरोपीय देशों सहित विदेशी नागरिक शामिल हैं। जिसमें एक लाख से अधिक पुर्तगाली और लगभग साढ़े तीन हज़ार भारतीय शामिल हैं।  
जिस प्रकार नेदरलॅंड्स प्रति व्यक्ति सायकल के अनुपात में दुनिया में पहले नंबर पर है उसी प्रकार लक्सेम्बर्ग दुनिया कारों के नाम पर पहले नंबर पर है। यहाँ के सड़कों पर अनायास ही फरारी, लूम्बर्गिनी ही नहीं बेंटले और रोल्स रॉयस जैसी गाड़ियां देखने को मिल जाएँगी  
लक्सम्बर्ग में हर साल २० अगस्त और १२ सितबर के बीच एक मेला लगता है जिसे शुबरफेर (Schueberfouer) कहते हैं और यह मेला लगभग ६८० सालों से चला आ रहा है और इसमें दुनिया का सबसे बड़ा घुमन्तु होने वाला रोलर कोस्टर भी लगता है।  
लक्समबर्ग शहर के पुराने किला का खंडहर अब यूनेस्को की धरोहर है और लाखों सैलानियों को यहाँ हर साल खींच लाता है। यदि आप भी इसका मजा लेना चाहें तो “पेत्रुसबस” नाम की सड़क पर चलने वाली रेलगाड़ी जैसी सवारी का मजा लेते हुए शहर के इतिहास को जानने का मजा लीजिये।
दुनिया के हर बड़े शहर की तरह यहाँ भी भारत की पहचान और गौरव यानि महात्मा गाँधी की प्रतिमा यहाँ के मुख्य उद्यान में भी प्रतिमा लगी है। इस प्रतिमा को १९७३ में स्थापित किया गया था जिसे भारत के एक बड़े मूर्तिकार और यह प्रतिमा इस बात में अनूठी है कि इसमें गांधी जी अपने प्रचलित मूर्तियों से काम उम्र के लगते हैं और उन्होंने अपना चिर परिचित चश्मा नहीं पहना है
लक्समबर्ग विश्व का पहला देश है जिसमें स्थानीय यातायात के सभी साधनों को मुफ्त कर दिया है, आपको यहां आने पर दूसरी श्रेणी में  बस, ट्रेन या ट्रॉम आदि में यात्रा करने के लिए कोई टिकट लेने की आवश्यकता नहीं है

यह शहर घाटी और पहाड़ी से भरा हुआ है और एक स्थान पर 65 मीटर ऊँची लिफ्ट है जिसमें से ऊपर-नीचे आते जाते पुराने शहर का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। और डचेस शार्लेट ब्रिज से पुराने किले के तराई का इलाका इतना खूबसूरत दिखता है की आप अपने मोबाइल या कैमरे से तस्वीर लिए बिना नहीं रह सकते।

कभी आइये लक्समबर्ग में आपका स्वागत है।  

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

कविता की खुशबु

देर रात
लगा जैसे
किसी ने
आवाज लगाई

देखा तो
पता चला
एक कविता
बैठी है
मेरे सिरहाने
चुपके से आकर

अचंबित!
मैंने पूछा
अरे कविता तुम?

प्यारी सी
मुस्कान के साथ
बोली
तुम नहीं आये न
बहुत दिनों से
मेरे पास
तो मैं ही
चली आयी
तुम्हारा हाल पूछने-
अच्छे तो हो न?

नहीं,
कई दिनों से
दिल उदास था
और कुछ
अच्छा
नहीं लग रहा था
लेकिन
तुम आयी हो ना
तो अब
मेरा दिल
बहल गया है|

तुम्हारा शुक्रिया
मेरी कविता,
मुझे
ख़ुशी हुयी
ये जानकर
कि तुम्हें 
फ़िक्र है मेरी| 

कविता 
फिर से मुस्कुराई 
और बोली 
मैं गई ही कब थी
तो आऊँगी
मैं तो
तुम्हारे अंदर ही हूँ
जब भी
अपने भीतर झाकों
मुझे हमेशा
अपने साथ पाओगे |

मैंने हाथ बढ़ाया
उसे छूने
तो वहां
कोई नहीं था
मगर
मेरे हाथो में
एक भीनी सी
खुशबु

जरूर भर गई थी

खुशबु
एक नयी
कविता की

बुधवार, 1 जुलाई 2020

दोस्ती

बहुत
अनूठा सा है
ये रिश्ता

उन सब से
अलग
जो बस 
बनते चले गए
जन्म के साथ 


ये रिश्ता तो
हमने 
खुद बनाया है
बचपन के 
भोले पन से 
सुरु कर के
और
निभा रहे हैं  
तरुणाई के रास्ते 
आज तक

इस रिश्ते में 
नहीं है
कोई ऊँच-नीच 
का झँझट
और ना ही  
कोई
प्रतिबन्ध है 
आदर्श के
किसी साँचे में 
उतरने का 

इस रिश्ते में 
तुम हो 
अपने आप 
के जैसे 
और मैं
भी हूँ
जस का तस 

नहीं है
कोई बनावट 
इसलिए 
नहीं लगता 
कि जैसे 
कोई साँकल 
पैरों पे
बाँधी हो 

और कोई 
दिखावा भी
नहीं है
तभी तो 
कभी नहीं 
होती घुटन 
तुम्हारे
आस पास
होते हुए 

भले ही 
लम्बे समय तक 
नहीं होती बात 
पर 
जब भी मिले 
वही गर्माहट 
और वही 
उन्मुक्त 
हँसी-ठहाके

खुद को 
बड़ भागी  
समझता हूँ 
के तुम 
मेरे साथी
मेरे मित्र हो

ईश्वर से 
करता हूँ 
यही प्रार्थना 
कि
तुम रहो
सदा खुशहाल
और
हमारी ये दोस्ती 
हमेशा ऐसे ही 
बनी रहे| 

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मनीष पाण्डेय, "मनु"
लक्सेम्बर्ग, बुधवार ०१ जुलाई २०२०

कुछ - 2


वो जो तुम
कहती हो ना
"कुछ"
ला रहे हो क्या
बच्चों के लिए

मैं जब भी
बाहर जाता हूँ
काम से

क्या तुम
जानती हो
कि मुझे
पता चल जाता है
अनकहे से
प्यार के
इजहार का

मैं जानता हूँ
कि तुम्हें
मेरी याद
आती है
मेरे
दूर जाने से

और
क्या तुम
समझ पाती हो
उस बात का
मतलब?

जब मैं
ये कहता हूँ
कि क्या
तुम्हें भी
"कुछ" चाहिए?

उसका मतलब
ये होता है कि
मुझे भी
तुमसे
उतना ही प्यार है|


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मनीष पाण्डेय, "मनु"
लक्सेम्बर्ग, बुधवार ०१ जुलाई २०२०

कुछ

वो जो तुम
पूछते हो ना
"कुछ"
लाना है क्या?

जब भी
बाहर जाते हो
काम से

क्या तुम
जानते हो
कि मुझे
पता चल जाता है
अनकहे से
प्यार के
इजहार का

मैं जानती हूँ
कि तुम्हें
मेरी याद
आती है
दूर जाके!

और
क्या तुम
समझ पाते हो
उस बात का
मतलब?

जब मैं
ये कहती हूँ
कि नहीं
मुझे तो
"कुछ"
नहीं चाहिए

उसका मतलब
ये होता है कि
मेरे लिए
तुम्हारा प्यार ही
"सब कुछ" है|

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मनीष पाण्डेय, "मनु"

लक्सेम्बर्ग, बुधवार ०१ जुलाई २०२०

मंगलवार, 23 जून 2020

चलते चलते

कविता की पाठशाला - गृह कार्य ३ - दिए हुए मुखड़े पर अन्तरे लिखें
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कहाँ आ गये चलते चलते
12     2   12  112  112     = 16
और कहाँ जाना
21   12   22                     = 10 => 26
भूल गए धरती की ख़ुश्बू
21  12  112   2   112       = 16
चिड़ियों का गाना
   112    2   2 2                 = 10 =>26

बतियाते सर्जन की बात
  11 22    211   2   21     = 15
कर निसर्ग का नास
  11  121    2   21           = 11 =>26
प्लास्टिक से पाटी अवनि
211        2   22   111       = 13
सेटेलाइट आकाश
22211      221                 = 13 =>26
शस्य श्यामला धरती रोती
  21   212      112   22    = 16
बन कचरा खाना
11    112    22                = 10 =>26

खुद से चलने लगे मशीन
  11  2  112   12  121     = 15
करने लगे विचार
  112  12  121                = 11  =>26
स्मार्ट हो गए टेलीफोन
 21    2   12   2221         = 15
लोग हुये लाचार
21   12   221                  = 11  =>26
पैदा होते सीख रहे
22   22    21   12            =  14
इंटरनेट चलाना 
21121   122                   = 12  =>26

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मनीष पाण्डेय, "मनु"
लक्सेम्बर्ग गुरुवार १८ जून २०२०

गुरुवार, 18 जून 2020

देश द्रोही

देश द्रोही
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आज जब
चुनी हुई
सरकार के कारिंदे

अपने ही देश के
नागरिकों को
ठहराते हैं
देश द्रोही


और भर देते हैं
जेल में


सिर्फ इसलिए कि
उन्होंने पूछे
कुछ सवाल


और
उठाये कुछ मुद्दे
जो दिखाते हैं
आईना


तो फिर
फिर सोचती होगी
ब्रितानी फ़ौज के
अफसरों  की आत्मायें


कि हमने
किया क्या गलत
किसी पराये देश के
गुलामों को


जेलों में भरकर
और गोलियों से भून

जो कर रहे थे
खुला विद्रोह
राज सत्ता के विरूद्ध
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मनीष पाण्डेय, "मनु"
लक्सेम्बर्ग गुरुवार १८ जून २०२०

शुक्रवार, 12 जून 2020

व्हाट्स एप ग्रुप की सदस्ता

व्हाट्स एप ग्रुप की सदस्ता
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कोई मुझे भी ग्रुप से निकाल दे, अनूप दादा बन जाऊँ
बेकार की बातों से फुर्सत हो के, कविता में ध्यान लगाऊँ

किसी और की फारवर्ड नहीं, अपनी कविता लिखूंगा
कविताई पे दूंगा ध्यान, और कुछ नया सीखूंगा

गीत गजल और नवगीत, सब को थोड़ा और समझूंगा
बड़े बड़ों ने जो लिक्खा है, उसका थोड़ा और पढूंगा

थोड़ी समझ बढ़ जाये तो, अच्छी कविता लिख पाऊँ
कोई मुझे भी ग्रुप से निकाल दे, अनूप दादा बन जाऊँ

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मनीष  पाण्डेय "मनु "
लक्सेम्बर्ग, शुक्रवार १२-जून २०२० 

बुधवार, 10 जून 2020

मैं स्वास नहीं ले सकता हूँ

मैं स्वास नहीं ले सकता हूँ
मैं स्वास नहीं ले सकता हूँ

क्यों ऐसे तुम मेरी गर्दन
अपने घुटनों में जकड़े हो
तुम जैसा ही मानव हूँ मैं
क्यों बाँध मुझे यूँ पकड़े हो
तुम तो वर्दी में आये हो
प्रतिकार नहीं दे सकता हूँ

जाने दो मुझको घर मेरे
इक बेटी राह निहारे है
हाँ छोटा सा घर मेरा है
जो चलता मेरे सहारे है
बाकी हैं मेरे काम बहुत
यूँ  प्राण नहीं दे सकता हूँ

तुम समझ नहीं सकते मुझको
पर कम से कम ये काम करो
मैं जन्मा ही अपराधी हूँ
मत अपयश मेरे नाम करो
पहले ही पीड़ित शोषित हूँ
दुख और नहीं सह सकता हूँ

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्ज़ेम्बर्ग बुधवार 10 जून 2020 

रविवार, 7 जून 2020

मानव तू केवल कठपुतली - नवगीत

मानव तू केवल  कठपुतली - नवगीत
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कुदरत के
इस रंगमंच का,
मानव
तू केवल
कठपुतली

पहुँच गया है
द्वार चाँद के
बना लिया है
उड़न खटोला
डींग हाँकता
घूम रहा है
आखिर तू ठहरा
बड़बोला
आया एक
विषाणु जिसने
कर दी तेरी
हालत पतली

अगड़े-पिछड़े
भेद ना कोई
देश पड़े हैं
चित चौखाने
किसे बचाएँ
छोड़े किसको
अपने कौन
कौन बेगाने
धंधा-पानी
सब चौपट है
जान बचाना
जंग है असली

जंगल काटे
जल-थल लूटा
किया निसर्ग का
रूप भयंकर
इतराता था
है विकास कह
बन के बैठा
बड़ा सिकंदर
खोदा उस
गड्ढे में गिरके
अकड़न सब
तेरी निकली

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्ज़ेम्बर्ग, रविवार ७ जून २०२०

शुक्रवार, 5 जून 2020

फर्क


एक हथिनी को 
मार डाला
किसी विक्षिप्त ने
हाय!
वो तो
गर्भिणी थी


अब मचा है
पुरे भारत में
कोलाहल 
और 
सब लगे हैं
उसकी निन्दा में

वैसे ही जैसे
ऑस्ट्रेलिया के
जंगल की आग में
जले अनगिनत
पशु-पक्षियों
के लिए
पीट रहे थे छाती

कपटी इन्सान!
खड़ियाली
आंसू बहाने में
माहिर है

क्या वो सब

जीव नहीं हैं
जिन्हे मारकर
रोज सजाता है
अपने खाने की
थाल?

कोई अपने
उन्माद के लिए
मारता है
तो कोई अपने
स्वाद के लिए

पर मारते तो
दोनों हैं ना?

समझायेगा
कोई मुझे
ऐसे मारने
और वैसे मारने
का फर्क?

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, शुक्रवार ०५-जून -२०२०

बुधवार, 3 जून 2020

भारत की माटी

भारत की माटी
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माटी होती है माटी तो
देश की हो या पर-देशी हो
सुरभि सौंधी हवा महकती
बरखा की बूँदें पड़ती जो

पर मेरे भारत की माटी
चन्दन बन माथा चमकाती
दाना, पानी और बिछौना
माँ के जैसे सब कुछ लाती

जिसमें मेरा बीता बचपन
यादों में है वो घर आँगन 
खेले खेल जहाँ हमजोली
उन गलियों में खोया है मन


भारत से तुम जा सकते हो
लेकिन नहीं भुला सकते हो
अपने साँसों में तुम उसकी
खुशबू हरदम पा सकते हो

उस माटी से बना हुआ हूँ
इसीलिए तो जुड़ा हुआ हूँ
फिर से उसमें मिल जाऊँगा
इस आशा में बँधा हुआ हूँ

भारत ही मेरी माँ रहती
वो भी मेरी राहें तकती
बरसों बीते बिछड़े तुमसे
आ जा मेरे बेटे कहती 

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्ज़ेम्बर्ग, बुधवार 03-जून-2020 




ना था कोई लक्ष्य विशेष
जाने कौन घड़ी थी जिसमें 
निकल चला आने परदेश   

मैटर उठा के लिखता हूँ

कविता तो मैं इधर-उधर से, मैटर उठा के लिखता हूँ
पापा लाईक नहीं करते, छुपके-छुपाके लिखता हूँ

लिखने-कहने जैसा क्या जो, आलरेडी मौजूद नहीं
मेरे जैसे न्यू-कमर्स का, यूँ भी कोई वजूद नहीं
मैं भी किसी से कम नहीं, ये ईगो चढ़ाके लिखता हूँ
कविता तो मैं...

पढ़ने से जादा लिखता, एव्हरी-बडी को सुनाता हूँ,
तुलसीदास से बेटर है, सोच के मैं ईतराता हूँ
ऐरी-गैरी कैसी भी हो, स्टाइल दिखाके लिखता हूँ
कविता तो मैं...

अपने मन-की-बात ही कहना, सिस्टम आज प्रभावी है
छोड़ दो मज़दूरों की बातें, सीजन नहीं चुनावी है
अच्छे से दोनों कानों में, कॉटन लगा के लिखता हूँ
कविता तो मैं...

जिनको नहीं पसंद आ रही, आँखें अपनी कर लें क्लोज़
अच्छी जिनको लग जाए, फ़ॉर्वर्ड करते जाएँ रोज़
दुनिया चाहे दे गाली, मैं स्माइल सजाके लिखता हूँ
कविता तो मैं...

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मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, मंगलवार ०२-जून-२०२०

कठपुतली - 1

कुदरत के इस रंगमंच का मानव रे तू कठपुतली है

चाँद के दर पे जा पहुंचा, एक बनाके उड़न खटोला
जीत लिया संसार कि जैसे गाल बजाता था बड़बोला
एक विषाणु आया है और देख हुई हालत पतली है
कुदरत के इस रंग मंच का....


जंगल काटे, धरती बाँटी, सागर को भी छान लिया था
उड़े गगन में ऐसे जैसे खुद को ईश्वर मान लिया था
तूने सोचा इत्ते भर से किस्मत तेरी चल निकली है
कुदरत के इस रंग मंच का...


छोटे-मोटे देशों की क्या बड़े-बड़े बेहाल हुये हैं
जहां-तहां बिस्तर पे देखो पड़े-पड़े कंकाल हुये हैं
धंधा पानी चौपट है पर जान बचाना ही असली है
कुदरत के इस रंग मंच का....

सोमवार, 1 जून 2020

सही-ग़लत की बात

जो मानते थे कि में कण कण में भगवान है
उनके लिए फ़र्क़ नहीं था पेड़ है या इंसान है

जो समझते थे उसका ही, चाहे धूप हो या छाँव
वो करते थे नमन रखने से पहले धरती में पाँव

तुम भी मैं और मैं भी तुम तो फ़र्क़ क्या रह जाता है
मानने-मनाने के कि लिए तर्क क्या रह जाता है

कहने को कह देना भी कोई कहने लायक बात है
ऐसे मुँह देखी करके तो कुछ ना आता हाथ है

कहते थे वैसा करते थे जैसे संत कबीर
रहिमन के दोहे बतलाते रखना थोड़ा नीर

नास्तिक नहीं मगर मैं डरता हूँ इंसान से
इनकी पूजा करनी पड़ती पहले उस भगवान से

अपनी सुविधा से जैसे ये अदा बदल लेते हैं
छोड़ें फटे-पुराने कपड़े वैसे ख़ुदा बदल लेते हैं

छोटी मुँह से बात बड़ी है,  करना मुझको माफ़
ऐसा क्यों है बतलाना ये करके दिल को साफ़

बात वही सुनना चाहे जो उसके मन को भाय
सही-ग़लत की बात कहो, तो हमको क्यों गरियाय

जितनी आसानी से हम लिख जाते हैं हर बात
उसको पालन करना क्यों न रहता हमको याद
—————————-
मनीष पाण्डेय “मनु”
लक्सम्बर्ग, सोमवार ०१-जून-२०२०

बुधवार, 27 मई 2020

शब्द चितेरा


शब्द चितेरा 
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कलम तूलिका हाथ लगा के, भावों से भर जाता हूँ
एक चितेरा शब्दों का, गीतों से रंग सजाता हूँ


कभी प्रेम की लीला रचता, या स्वारथ का दावानल
कभी दिखाता महासमर, या कभी सजाता रंग-महल
कभी बुढ़ापा कभी बाँकपन, सबके रूप दिखाता हूँ

कहीं उड़ेला गंध प्रेम का, कहीं प्रेम निर्वासित मन
कहीं छटाएँ हरियाली की, कहीं कटीले निर्जन-वन
कहीं रात की काली छाया, कहीं धूप बरसाता हूँ

केवल सुख से मोह नहीं, संताप भी रँगा करता हूँ
कमी हुई जो राग-द्वेष में, नव भावों से भरता हूँ
माँ की धवली आँचल में, नवजीवन रंग खिलाता हूँ

शब्दों को ऐसे बाँधा है , भावों के अनुबन्धों में
जीवन की कविता रंगी है, सतरंगी से छन्दों में
देश प्रेम का रंग बसंती, माथे पे चमकाता हूँ

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, बुधवार  २७ मई २०२०

रविवार, 24 मई 2020

मेरे साथ चल

मेरे साथ चल
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तुम्हें स्वीकार मेरा साथ हो तो साथ चल
दे कर मेरे हाथों में अपना हाथ चल

नहीं मैं राम के जैसा कोई आदर्श वाला
न कृष्ण के जैसा ही कोई गुण निराला
भले न ठाठ हो ऊँचे महल में रहने वाला
मगर हाँ बाँट के खाऊँगा अपना हर निवाला

तुम्हें किस्से सुनाने है मेरी हर बात के
करूँ साझा तुम्हारे साथ हर दिन-रात चल

जब मन उदास हो, तो बस चुप बैठ जाता हूँ
कुछ हाथ लग जाए, तो फिर मैं ऐंठ जाता हूँ
कोई जो खीझ होती है, तो फिर बड़बड़ाता हूँ
लगे कोई बात अच्छी तो, उसे गुन-गुनाता हूँ

तुम्हें साथी बनाना है मेरे हर रंग का
बतानी है मेरे दिल की तुम्हें हर बात चल

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, रविवार  २४ मई २०२०

रविवार, 17 मई 2020

थी प्रीत जहां की रीत सदा

जब जीरो दिया  मेरे भारत को
मेरे भारत को, मेरे भारत को
सबने मुझको लानत भेजी

गिनती से ज्यादा मुश्किल है
दुनिया को सीखने चलते हैं
तारों की बातें करते हैं
पर लोग तो भूखे मरते हैं

मिलता न दशमलव भाग में भी
जो दिल्ली से पैसा आता है
धरती और चाँद की दूरी से
इन्सान की दूरी ज्यादा है

सभ्यता जहाँ से गायब है
सभ्यता जहाँ से गायब है
स्वारथ की सबको आती कला

अपना भारत वो भारत है
जिसके पढ़े लिखे संसार में है
खुद आगे बढ़े, बढ़ते ही गए
पर देश तो पीछे छूट गया

भगवान भरोसे देश चले
फिर भी इसमें कुछ बात तो है
आओ सब-मिलकर काम करें
ताकि ये थोड़ा आगे बढे
बढ़ता ही रहे और फूले फले
बढ़ता ही रहे और फूले फले


(आगे और सुनाऊँ क्या?)

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थी प्रीत जहां की रीत सदा,
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला था,
भारत की बात सुनाता हूँ


काले गोरे का भेद नहीं
पर जात-पांत भरमाता है
कुछ और न आता हो हमको
पर बात बनाना आता है
जब ऊंच-नीच की बात चले-2
मैं अपने मुंह को छिपाता हूँ
भारत का रहने वाला था
भारत की बात सुनाता हूँ


जीते हों किसी ने देश तो क्या
हमने तो दिलों को जीता है
बस इसी भरम में भूले हैं
और देश अभी तक रीता है,
जब वोट की बात निकलती है -2
मैं नित-नित शीश झुकाता हूँ
भारत का रहने वाला था
भारत की बात सुनाता हूँ

इतनी ममता नदियों को भी
जहाँ माता कह के बुलाते हैं
पर खुद की माँ का पता नहीं
कैसे हम दिल को दुखाते हैं,
कैसा परिवेश बदलता है -2
ये सोच के मैं घबराता हूँ
भारत का रहने वाला था
भारत की बात सुनाता हूँ


इन्सान का आदर हो न भले
पत्थर तो पूजा जाता है
दिन-रात की मेहनत मेरी है
पर पैसा सेठ बनाता है
अब देख रही सारी दुनिया -2
मजदूर हूँ पैदल जाता हूँ 
भारत का रहने वाला था
भारत की बात सुनता हूँ


थी प्रीत जहां की रीत सदा
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला था
भारत की बात सुनाता हूँ 

शनिवार, 9 मई 2020

क्यों डालते हैं विघ्न?

क्यों डालते हैं विघ्न?
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ये भूखे-नंगे
और
जाहिल-गंवार लोग
जाने क्यों
बस मरने के काम
करते हैं?

और यदि
मरना ही है
तो क्यों नहीं मरते
भूख से
और बेकारी से
जहाँ हैं वहाँ
छिपकर?

ऐसे रास्तों में,
रेल की पटरियों पर,
या बैंक की क़तारों में
मर-मर कर
भला क्यों
मज़ा बिगाड़ते हैं
खेल-तमाशे का
बार बार?

क्या समझते हैं,
इनकी बेकार
की चीख पुकार से
करतल ध्वनि का
संगीत फीका पड़
जायेगा?

देखते नहीं
फूल बरस रहे हैं
आसमान से,
वैसे ही जैसे
रामायण और महाभारत
के दिनों में
स्वर्ग से बरसा करते थे?

इतने दीये तो
क्या उस दिन भी
जले होंगे
जिस दिन राम आये थे
अवध में लौटकर
चौदह बरस के बाद?

इतने मगन
तो लोग
क्या उस दिन भी
हुए होंगे
जिस दिन खुद
कन्हैया जमुना किनारे
बजाते थे बंसी?

इतनी देश-भक्ति
तो क्या तब रही होगी
जब देश था गुलाम
और लाठी टेकते गाँधी
सबको साथ ले
निकल पड़े थे
आजादी की राह में?

मन की बात
कहूं तो
लगता है कि
ये बेगैरत लोग
पैदा ही क्यों होते हैं
यूँ वक़्त-बे-वक़्त
मर जाने के लिए?

क्यों
बार-बार
डालते हैं  विघ्न
किसी के
महान से भी महानतम
होने के
अभियान में?

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मनीष पाण्डेय "मनु"
शनिवार ०९-मई २०२०, लक्सेम्बर्ग

बुधवार, 6 मई 2020

कोविड-19 के दोषी कौन?

नीली आँखें
और अति गौर वर्ण,
तुम्हारा रूप तो
अतुलनीय है।

भ्रम होने लगता है
तुम्हे देख कर,
देवदूत?
यदि नहीं तो संभवतः
यक्ष या गन्धर्व?

देखा तो नहीं उन्हें
किन्तु लगता है,
वो तुम जैसे ही
दिखते रहे होंगे।


छोटे-छोटे
भू-भाग में बसे
किन्तु तुम
विश्व विजयी
और महा शक्तिशाली।

तुम्हारा
धन और वैभव
विशाल है,
और
सुख-सुविधाओं में
तुम्हारा देश
इंद्रलोक के सामान।

स्वप्न है
अनगिनत लोगों का,
तुम्हारी धरती पर
आना और यहाँ बसना।

क्या
यही अभिमान था
जो सर चढ़ गया?

जो तुमने
ये तय कर लिया
कि कोरोना
तुम्हे छू नहीं सकता।

तुमने संभवतः
ये भी मान लिया था
कि कोविद-१९
एशिया और अफ्रीका
के गरीबों की
बीमारी है।

क्या इसी
भ्रम में मंत्र-मुग्ध
घूम रहे थे स्वछन्द,
जब कोरोना का विषाणु
धीरे-धीरे जमा रहा था
अपना पांव?

बच्चे-बूढ़े और युवा,
इतने लोग
समा गए
काल की गाल में,
ये सब कैसे हुआ?

सुना है कि
खाट कम पढ़ रहे थे
लोगों को सुलाने,
फिर छोड़ दिया
उनको किसी कोने में
जो पहुँचे थे
आखरी पड़ाव पर।

दिया होगा चीन ने
जन्म इसे
जाने-अनजाने,
लेकिन
इतिहास
जब खोजेगा
इस महामारी
के विस्तार का हेतु-
तो उसमे
तुम्हारा नाम भी होगा।
 
यूरोप के निवासियों
पूरी दुनिया में
इसका प्रकोप
बढ़ाने के दोषी तो
तुम कहलाओगे
हाँ तुम!


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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, 6 मई 2020

बिलकुल नहीं आता

नहीं आता मुझे
ऊपरी दिखावे के साथ
रिश्ते बनाना,
और अनमने से निभाना तो
बिलकुल नहीं आता |

नहीं आता मुझे
खोखले वादे करना,
और झूठे सपने दिखाना तो
बिलकुल नहीं आता |

जो होता है
मेरे मन में वही बात
कहता हूँ साफ-साफ,
चिकनी-चुपड़ी बातों से
बातें बनाना तो
बिलकुल नहीं आता |

जो भी करता हूँ
बस उसी में
डूब के करता हूँ,
ऊपर-ऊपर से
छू कर निकल जाना तो
बिलकुल नहीं आता |

बस खो जाता हूँ
जो हो रहा है उसी में,
फिर मैं या मेरे होने का
भाव दिखाना तो
बिलकुल नहीं आता |

अपने आप को
भुला देने के बाद
होती है एक ख़ुशी,
और स्वयं को
पहचानने का
जो मिलता है सुख
उसे शब्दों में बताना तो
बिलकुल नहीं आता |

ईश्वर ने सदा ही
बढ़-चढ़ के की है
कृपा मुझपर,
और उस ऊपर वाले
की दया का मोल चुकाना तो
बिलकुल नहीं आता |

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मनीष पाण्डेय "मनु" लक्सेम्बर्ग, ६ मई २०२०



बुधवार, 1 अप्रैल 2020

दिल ढूंढता है

इन्सान कामकाज के चक्कर में गाँव-घर से निकल तो जाता है लेकिन हर बात हर जगह पर उसे जो पीछे छूट गया है उस की याद आती रहती है और नई जगह के नए चीजों में कहीं कहीं से उसे बिछड़े की छवि दिख जाती है। ऐसा लिखते हुए मुझे गजल सम्राट जगजीत सिंह की आवाज में प्रसिद्ध गीत ‘कहीं कहीं से हर चेहरा, तुम जैसा लगता है’ की याद हो आयी। और तो और यह गाना जिस एल्बम का है उसका नाम भी सटीक है- ‘दिल कहीं होश कहीं’। वैसे गाँव घर को छोड़कर जाने वालों के दर्द का बयान डॉ राही मासूम रजा के लिखे और एक बार फिर से जगजीत सिंह की रूहानी आवाज में गाये इस  कालजयी नगमे ‘हम तो हैं परदेस में, देश में निकला होगा चाँद’ से  बढ़कर कोई और नहीं कर सकता

ऐसा नहीं है कि यह टीस सिर्फ उन्हें आती है जो सच में परदेश में होते हैं बल्कि हर उस इंसान को होती है जो अपनों से दूर किसी और जगह पर भले वह जगह महज पाँच-दस किमी की दूरी पर ही क्यों ना हो लेकिन जो सच में परदेश में हों उनकी टीस में सोने के पिंजरे में कैद मोती चुगने वाले पंछी की टीस होती है जिसके पर कुतरे हुए हों। ये अलग बात है कि ये सोने का पिंजरा किसी और ने नहीं बल्कि पंछी ने खुद बनाया है और उसके पर कुतरे नहीं हैं बल्कि उसने खुद ही सिकोड़ लिए हैं। जब चाहे वो मोतियों भरी कटोरी को ठोकर मार और पिंजरा खोल उड़ सकता है, जरूरत है तो बस पंखों को खोल कर फड़फड़ाने की। लेकिन ऐसा होता नहीं है या कहें ऐसा कोई करता नहीं है। इंसान भी गजब जीव है उसे दोनों हाथों में लड्डू चाहिए और हो सके तो मुँह में भी ठूँस ले।

अब जब देश से बाहर रहने ही लगे तो फिर धीरे धीरे उसमें रचने बसने भी लग ही जाते हैं लेकिन शुरुआत के दिनों में हर नई चीज से किसी ना किसी पुराने को जोड़ने के मोह से बच नहीं पाता है। ऐसे ही कुछ मेरे अनुभव और मोह पास के धागों की गुत्थी आपसे साझा कर रहा हूँ।

1) हेलोवीन का त्यौहार
मैं मूल रूप से भारत में छत्तीसगढ़ राज्य का निवासी हूँ और इस प्रांत को “धान का कटोरा” कहते हैं। सहज है कि फिर इस प्रांत में ऐसे कई त्योहार होंगे जो धान के बुआई, रख-रखाव से लेकर कटाई और भंडारण तक के विषयों से जुड़े होंगे। उन्हीं त्योहारों में से एक विशेष त्योहार है जिसका नाम है “छेर-छेरा”। यह त्योहार हिंदी पंचांग के अनुसार पूस माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। साल के इस समय तक फसल की कटाई के बाद मिसाई (वह प्रक्रिया जिसमें धान के बीजों को उसकी बालीयों से धान के रूप में अलग किया जाता है) हो चुकी होती है। परम्परागत रूप से इस समय तक लोग साल भर के खाने और अन्य उपयोग के लयक धान अपने घर की कोठियों (छत्तीसगढ़ी भाषा में इस शब्द का मतलब उन परम्परागत भंडारण की जगह से होता है जिनमें अनाज, दलहन और तिलहन आदि सुरक्षित रखा जाता था) में भर लिया जाता था। वैसे तो त्योहार से जुड़ी कई मान्यताएँ प्रचलित हैं लेकिन मूल धारणा यह है कि जिसकी जितनी हैसियत है उस हिसाब से वह दूसरों के साथ धान बाँटता है ताकि गाँव में कोई भूखा और वंचित ना रह जाए। इस दिन किसान से लेकर मजदूर तक घर-घर जा कर धान का दान माँगते है और ऐसे करने के लिए दरवाजे पर हाँक लगाकर कहते हैं - “छेरछेरा, कोठी के धान ला हेर ते हेरा” जिसका मतलब होता है कि हम छेरछेरा माँगने आए हैं और आप कोठी से धान निकालकर दीजिए। बचपन से घर के बड़ों को तैयारी के साथ दरवाज़े के पास धान रखने और देने के लिए छोटी टोकरी के साथ खाने पीने के सामान की व्यवस्था करते देखा है।सुबह से दोपहर तक लोग आते जाते और टोकरी में धान दिया जाता। किसी के मन में माँगने का हीनभाव नहीं और किसी में मन में देने का अभिमान नहीं। दोनों ऐसे अपना काम करते जैसे कि ग्रामीण जीवन के खेला में अपना अपना किरदार निभा रहे हों।

ज़मींदार घरों के बच्चे होने के कारण हमें तो धान माँगने जाने की जरुरत नहीं होती थी पर कौतूहल वश हम अपने घर में चाचा-ताऊ आदि से छेरछेरा माँगा करते थे और जो धान मिला उसे पास के दुकान वाले को देकर खाने पीने का सामान लेते थे। मैं संतरा गोली और मिक्चर जरूर लेता था।

बात सन् 2007 की है जब मुझे अमेरिका आए हुए साल भर नहीं हुआ था और मैं उत्तर कैरलाइना राज्य के शहर “शार्लट” में रहता था। हम तीन साथी एक घर में रहते थे और अन्य कई साथी उसी मोहल्ले में अन्य घरों में रहते थे।अक्टूबर महीने के दूसरे सप्ताह आते-आते दुकानों में और विज्ञापनों में एक अलग सुगबुगाहट होने लगी थी। भूतिया मुखौटे, कंकाल, ड्रैक्युला आदि के कपड़े, चमगादड़, डरावने से और कद्दू के बने लालटेन जैसी चीजें सजने लगीं दुकानों पर तो उत्सुकता हुई कि ये सब क्या है? पूछताछ करने पर पता चला कि “हैलोवीन” का त्योहार आ रहा है। इस वर्ष यह त्यौहार बुधवार ३१ ऑक्टोबर २००८ को पड़ने वाला था।

और पता चला कि इस दिन शाम ढलने के बाद अंधेरा होने पर बच्चे (और कहीं कहीं बड़े भी) ऐसे उटपटाँग से डरावने कपड़े पहनकर और हाथ में दिए वाले लालटेन या बैटरी वाले लटकते लालटेन लेकर निकलते हैं और घर घर जा कर “ट्रिक ऑर ट्रीट” कहते हैं। उनका आशय होता है कीं या तो हमें कुछ ट्रीट मतलब चॉकलेट, टॉफी या और कुछ इस तरह के बच्चों के खाने की चीजें, कुछ छोटे खिलौने आदि जो आपका मन वो दीजिए या फिर हम उत्पात मचाएँगे। कुछ बच्चे हैलोवीन वाले समूह गीत भी गाते चलते हैं। बच्चे छोटे हों तो उनके पालक भी साथ चलते हैं और बड़े हों तो टोली बना कर निकल पड़ते हैं। काफिला इस तरह एक घर से दूसरे जाता जाता है और उनके छोले तरह तरह के खाने पीने के सामान और खिलौनों से भरते जाते हैं। किसी अपने के घर पहुँच गए तो और भी कुछ मोटी भेंट हाथ लग जाती है।



जब हैलोवीन का दिन आया बड़ी उत्सुकता से हम देखने लगे और एक टोली के पीछे हो लिए। बहुत ही शानदार माहौल बन गया था और सभी बड़े प्यार से नन्हे नटखटों का स्वागत करते और इन्हें खाने पीने की चीजें देते।

यह सब देखकर मुझे अपने बचपन के त्यौहार “छेरछेरा” की याद हो आयी फिर मैं रुक कर अपनी माँ को फोन लगाकर “हैलोवीन” के बारे में बताने लगा और बच्चों की टोली हँसते गाते आगे चली गयी।

2) क्रिसमस की सजावट
दिवाली के त्योहार पर घरों में होने वाले रंग-रोगन और सजावट के बारे में किसी को बताने की जरुरत नहीं है। भले अब समय थोड़ा बदल रहा है और लोग अपनी सुविधानुसार काम करने लगे हैं लेकिन नब्बे के दशक में जब हमारी पीढ़ी बड़ी हो रही रही थी तबतक दिवाली के पहले ही घरों में साफ़ सफ़ाई के। आस पुताई का काम होता था। पता नहीं कितने दिवाली हमने पेंट के धब्बों वाले हाथ पैरों से मनाई है जो घर के खिड़की-दरवाज़े और कुर्सी-टेबल की पुताई करते हुए लगे थे।उसके बाद आता था दौर घर के बाहर बिजली झालर, आकाश दिया और कंदील लगाने का। तब तक बाज़ारों में चाइना के बने फैंसी बल्ब के झालर नहीं आते थे। उत्तरप्रदेश के उद्योगों में बने दो टांगों वाले छोटे बल्बों की लड़ी बनाने के लिए हाथ से तार मोड़-मोड़ कर झालर बनाते थे और छोटे-छोटे मोटरों से बने लड़की के स्विच से उनके जलने बुझने के क्रम बनाए जाते थे। दुकानों और बड़े प्रतिष्ठानों में “टेंट और डेकोरेशन” वालों के सजावट लगते थे। कहीं-कहीं बिजली से बनी झाकियाँ भी लगती थी जिसे हम दिवाली की रातों को देखने जाया करते थे। तब तक दिवाली को लगभग पूरे पाँच दिन तक दुकानों, घरों और सड़कों की चमक दमक देखते ही बनती थी।

अमेरिका में मेरा आना हुआ १६ दिसम्बर २००६ को और तब तक क्रिसमस का खुमार सब तरफ चढ़ने लगा था इसलिए एर्पॉर्ट से ही सजावट, क्रिसमस ट्री और क्रिसमस से जुड़ी झाँकियाँ जैसे की रेनडियर, स्लेज में सवार सांता आदि लगने शुरू हो गए थे।कुछ दिनों में रिहायशी इलाकों में भी लोगों ने और  भी कई तरह की झाँकियाँ लगानी शुरू कर दी और उनकी खूबसूरती एकदम मन को मोह लेती थी। हम जहां रहते थे इस मोहल्ले में भी सजावट होने लगी और ऑफ़िस के बिल्डिंग, सामान लेने जाते इस सुपर मार्केट, बैंक, रेस्टोरेन्ट आदि सभी जगह जगमगाहट और सजावट हो गयी। ऑफिस आते-जाते सड़कों पर भी वही नजारे होते थे।

चूँकि मैं भारत के ऐसे इलाके से आता था जहाँ मसीहीयों का समुदाय बहुत छोटा और सिमटा हुआ था तो कभी क्रिसमस की ऐसी सजावट देखी नहीं थी और मन में एक धारणा बन गयी थी क्रिसमस की सजावट और बाकी सब हो-हल्ला सिर्फ बाजार और व्यापार के लिए है। फिल्मों या टीवी पर देखे सजावट से कोई व्यक्तिगत अनुभव जुड़े नहीं होते हैं। इसलिए क्रिसमस की यह सजावट बहुत आकर्षित करती थी।

सन् 2008 की गर्मी में शादी के बाद काम के कारण अक्टूबर महीने में हम लोग न्यू जर्सी के एक छोटे से शहर पोर्ट मैमथ रहने चले आए। न्यू जर्सी की फिजा शार्लट से बहुत अलग थी। शार्लट में हम जिस मोहल्ले में रहते थे उसमें अधिकांश बाहरी लोग रहते थे जो कामकाज के सिलसिले में वहाँ रहते थे। भले एक बड़ा तबका अमेरिकियों का भी था लेकिन वे भी प्रान्त या देश के किसी ना किसी अलग जगह से आए थे। पर अब हम जहाँ रहने आए वो जगह स्थायी रहने वालों का मोहल्ला था और बहुत कम लोग थे जी हम जैसे प्रवासी थे।

फिर आया क्रिसमस का मौसम और मैंने अपनी पत्नी को सजावट के अपने अनुभव सुनाने लगा पर साथ ही कहता जाता कि पता नहीं यहाँ कैसा होगा क्योंकि ये रिहायशी इलाका है और मेरी समझ में क्रिसमस तो व्यापारिक जगहों पर अधिक ताम-झाम से होता है। मेरी अपेक्षा के विपरीत जब सजावट होने लगी तो पता चला कि लोग सचमुच क्रिसमस को बड़े लगन से मानते हैं। लगभग हर घर के दालान में कुछ ना कुछ सजावट थी और एक से बढ़कर एक। फिर क्रिसमस के एक दिन पहले थोड़ी बर्फबारी हुई तो फिर तो क्या कहना। सब कुछ ऐसा लग रहा है था जैसे सच में नहीं बल्कि किसी फिल्म के सेट का हिस्सा हो। मेरी पत्नी ने इच्छा जताई कि क्यों ना हम सब सजावट देखने चलें और फिर क्या था हम निकल पड़े अपनी कार में बैठकर सडकों पर गाड़ी चलाते हुए सजावट देखने बिलकुल उसी तरह जैसे अपने शहर में दिवाली की सजावट देखने जाया करते थे।



3) ग्रैंडफादर माउंटेन - उत्तर कैरोलिना
अमेरिका जाने से पहले मैं लगभग दो साल  तक पुणे शहर में रहा और शायद आपको पता हो कि पुणे के आस पास बहुत से किल्ले और गढ़ हैं जो कभी मराठा राजवंशों के बड़े बड़े राजा-रजवाड़ों के शक्ति केंद्र होते थे लेकिन आज पिकनिक और चढ़ाई आदि के स्थल रह गए हैं। उन सभी में सिंहगढ़ के किले का नाम सबसे ऊपर आता है और कोई अपने आपको तब तक पुणेरी नहीं कह सकता जब तक उसने सिंहगढ़ के किले में गया ना हो और समय के साथ खोये उसके वैभव को अनुभव करने का प्रयास ना किया हो। सिंहगढ़ का किला पुणे शहर से कुछ 25 किमी की दुरी पर है। सहयाद्रि पर्वत श्रंखला के पूर्वी किनारे में बना यह महान किला समुद्र तल से कुछ सात सौ मिटर की ऊंचाई पर स्थित है और उसके उसके दुर्ग द्वार तक जाने के लिए अनमने से खड़े कई पहाड़ियों के लेटे किसी बड़े अजगर के शरीर जैसे घुमावदार रास्तों पर गाड़ी चढ़ाना पड़ता है। यदि आपकी गाड़ी पुरानी हुई तो बस यूँ लगता है कि किसी बूढ़े घोड़े के तरह जवाब ना दे दे। पहाड़ी से उतरना भी अपने आप में एक कठिन काम होता था क्योंकि गहरे से ढलान वाले रास्तों में गाड़ी यदि गेयर में ना हो तो नियत्रण से बाहर होकर तेज चलने लगती है और मोड़ पर नहीं सम्हाल पाए तो गाड़ी नीचे और आप ऊपर। गेयर में लगाकर चलायें तो गाड़ी बहुत आवाज करती है क्योंकि एक्सिलरेटर तो दिया नहीं जाता क्योंकि गाड़ी पहले ही तेज चल रही है। कुल मिलाकर चढ़ना और उतरना दोनों से जोखिम का ही काम है खासकर किसी नौसिखिये के लिए।

पुणे में रहने के दौरान अपने दोस्तों के साथ मैं कई बार उस किले में गया हूँ और उसके पुराने किले के दीवारों पर बैठकर दूर तक प्रकृति की सुंदरता को निहारता बैठा रहा हूँ। ऊपर पहाड़ी पर एक ऐसी जगह है जिसे “विंड पॉइंट” कहते हैं और स्थान विशेष पर होने के कारण यहाँ पर हवा का तेज बहाव होता है। सबसे बड़ी खूबी यह है कि जब आप पहाड़ी से खाई की ओर प्लास्टिक, कपड़े या कागज जैसी कोई चीज जैसे फेंकते हैं तो वो चीज नीचे जाने के बदले ऊपर की और उठने लगती है।

वैसे तो किसी भी मौसम में सिंहगढ़ की यात्रा मजेदार होती है पर सबसे अच्छा समय होता है बरसात का मौसम क्योंकि इस मौसम में वहाँ बादलों के झुण्ड भी आये होते हैं जो क्षत्रपति शिवाजी महराज के वीर सेनापति तानाजी मालसुरे के वीरता और उनके बलिदान की याद में रुआँसे से होकर यहीं रुक जाते हैं। हम भी एक बार उतरती जुलाई या फिर चढ़ते अगस्त में गए थे और उस दिन भी ऐसा ही कुछ मौसम था तो ऐसा लग रहा था जाने किस हिल स्टेशन पर आ गए हैं। सबसे खास बात थी कि दो पत्थर को रखकर बनाये चूल्हे पर बन रहे पिठला को जलती लकड़ी के ऊपर सिंकते भाखरी के साथ खाने को मिला जो शर्द हो रहे मौसम के हिसाब से बहुत ही लाजवाब लग रहा था। मुँह पर उसका स्वाद आज भी ऐसा बसा है कि याद करके ही मुँह में पानी आने लगा है।

जब मेरी शादी हुई तब मैं पहले से ही अमेरिका में रहता था और शादी के बाद पत्नी भी साथ ही शार्लेट आ गई। उन दिनों हम लोग जब भी मौका मिला तो आस पास घूमने चले जाया करते थे। गूगल में आस पास में कोई नई जगह खोजी और निकल पड़े कार से। ऐसे ही एक बार पता चला कि हमारे घर से कुछ एक सौ बीस मील की दूरी पर “ग्रैंड फादर माउंटेन” नाम की एक खूबसूरत पहाड़ी है और उसके सबसे ऊपरी चोटी पर लक्ष्मण झूला (स्विंगिंग ब्रिज) है। शनिवार की सुबह थी तो आनन फानन में खाने पीने का कुछ सामान रखकर हम दोनों निकल पड़े अपनी कार से। रास्ते में बहुत खूबसूरत नजारे देखते हुए हम उस पहाड़ी के तलहटी पर पहुँचे तो एकबार तो लगा कि सचमुच इस पहाड़ी पर जाना है? चूँकि निकल ही पड़े थे सोचा चलो देखते हैं जाकर, ऐसे भी उसके बारे में गूगल में बहुत गुणगान पढ़ कर आये थे तो बीच रास्ते से लौटना सही नहीं लगा। मन में संशय के साथ गाड़ी पहाड़ी के रस्ते में घुमा दी और कभी दूसरे तो कभी तीसरे गेयर के सहारे गाड़ी चढ़ने लगी। रास्ते में ऐसी कई जगहें थी जहाँ पर लोग रुक कर नीचे की तलहटी के दृश्यों का मजा लेते थे और जब चढ़ते-चढ़ते ऐसा लगा कि गाड़ी ने बहुत दम लगा लिया तो ऐसे ही एक जगह पर रुक गए।

अगले पड़ाव में हम ऊपर तक पहुँच ही गए और वहां का नजारा देखते ही बनता था। अमेरिका में सब कुछ व्यापार से जुड़ा होता है तो वहाँ खाने-पीने की दुकानों के साथ उपहार और प्रतीक चिन्हों (गिफ्ट और सोवेनियर) की भी दुकान थी। हमने झूलते पुल, पहाड़ी आदि के नजारों के साथ घर के बने खाने का मजा लिया और फिर शाम ढलने के पहले घर के लिए निकल पड़े। मैंने ऊपर जाते हुए यह  तो सोचा ही नहीं था कि ऐसी पहाड़ी ढलानों में गाड़ी ऊपर ले जाना जितना कठिन लगता है उससे कहीं कठिन होता है गाड़ी नीचे उतारना। और ग्रैंडफादर माउंटेन से सम्हल-सम्हल कर गाड़ी उतारते हुए सिंहगढ़ की याद आई एक दिन अपनी पत्नी को भी सिंहगढ़ ले जाने की बात कहते सुनते घर की और चल दिए।



ऐसे और ना जाने कितनी और घटनाएं और जगहें हैं जो बीते दिनों की याद दिलाती रही हैं। जैसे चेस्टनट के बौर आने पर वसन्त पंचमी तक आम के पेड़ों पर लद जाने वाले बौर को खोजना या सितम्बर महीने की ढलती शाम में दिवाली के दिनों के गुलाबी ठण्ड की याद हो और सन् 1995 में स्कुल की ओर से राज्य स्तरीय विज्ञान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए सागर शहर जाने और पहाड़ी पर बसे उस शहर को लक्समबर्ग शहर के उतर चढाव में खोजना। पता नहीं क्यों हर आने वाले पल में बीते हुए पलों की याद आती है।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

तुम्हारी यादें

यादें,
तुम्हारी यादें,

किताबों में दबे
सूखे फूल की पखुड़ियों तरह,
यादों के पन्नों खुलते ही
ख़ुशबू बिखेरती
तुम्हारी यादें!

कभी तो
चुपके से चली आती हैं
दबे पाँव,
और कभी
किसी सैलाब की तरह
सब कुछ बहा ले जाती हैं
तुम्हारी यादें!

कभी तो
बहुत रुलाती हैं
और कभी खुब हँसाती हैं,
सचमुच 
तुम्हारी तरह ही
बहुत प्यारी
मगर बिलकुल मासूम हैं,
तुम्हारी यादें!

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, मंगलवार २४ मार्च २०२० 

बुधवार, 1 जनवरी 2020

तुम जो बस गए दिल मे

तुम जो बस गए दिल मे, इसे अब और  कुछ भाता नहीं
नहीं लगता कहीं भी मन, इसे अब कोई बहलाता नहीं!!

तेरी जब याद आती है, तो ठंडी आह भरता हूँ 
दिल ही दिल में तड़पता हूँ, मगर चुपचाप सहता हूँ
दर्द-ए-दिल में कोई मरहम किसी भी काम में आता नहीं
तुम जो बस गए दिल में, इसे अब और कुछ भाता नहीं


यूँ तो मैं मुस्कुराता हूँ,  ख़ुशी के गीत गाता हूँ 
महफ़िलो में भी जाता हूँ हज़ारों लोग मिलते हैं
गले सबको लगाता हूँ मगर दिल से लगा पाता नहीं
तुम जो बस गए दिल में, इसे अब और कुछ भाता नहीं

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मनीष पाण्डेय "मनु"
लक्सेम्बर्ग, बुधवार १ जनवरी २०२०